शरीर के गतियों के माध्यम से अर्थ को संवहन करने के रूप को किस अभिनय के नाम से जाना जाता है?

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शरीर के गतियों के माध्यम से अर्थ को संवहन करने के रूप को आंगिक अभिनय के नाम से जाना जाता है। भारतीय नाट्य और नृत्य परंपरा में अभिनय का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जब कलाकार शरीर की गतियों के माध्यम से अर्थ का संवहन करता है तो इस रूप को आंगिक अभिनय कहा जाता है। यह अभिनय का वह स्वरूप है जिसमें शब्दों के बिना भी भाव, विचार और कथा दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाई जाती है।

शरीर के गतियों के माध्यम से अर्थ को संवहन करने के रूप को आंगिक अभिनय के नाम से जाना जाता है।

आंगिक अभिनय की अवधारणा

आंगिक अभिनय की परिकल्पना और उसका शास्त्रीय विवेचन प्राचीन भारतीय ग्रंथ नाट्यशास्त्र में मिलता है जिसके रचयिता भरत मुनि माने जाते हैं। नाट्यशास्त्र के अनुसार अभिनय चार प्रकार का होता है - आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्त्विक। इनमें आंगिक अभिनय सबसे आधारभूत माना गया है क्योंकि यह सीधे शरीर की भाषा से जुड़ा होता है।

शरीर ही भाषा

आंगिक अभिनय में शरीर के विभिन्न अंग - हाथ (हस्त), पैर (पद), आँखें (नेत्र), भौहें, गर्दन, कंधे और मुख सभी अभिव्यक्ति के माध्यम बनते हैं। हस्त मुद्राओं से वस्तु, पात्र या भाव का संकेत मिलता है, नेत्राभिनय से सूक्ष्म भाव प्रकट होते हैं और शरीर की गतियाँ कथा को आगे बढ़ाती हैं। इस प्रकार कलाकार का पूरा शरीर एक जीवंत भाषा बन जाता है।

शास्त्रीय नृत्य और नाटक में भूमिका

भरतनाट्यम, कथक, कथकली, ओडिसी, कुचिपुड़ी, मणिपुरी जैसे सभी भारतीय शास्त्रीय नृत्य रूपों में आंगिक अभिनय का केंद्रीय स्थान है। नृत्य में जब नर्तक बिना बोले ही प्रेम, वीरता, करुणा या क्रोध जैसे भावों को दर्शकों तक पहुँचा देता है तो वही आंगिक अभिनय की सफलता मानी जाती है।

सांस्कृतिक और कलात्मक महत्व

आंगिक अभिनय भारतीय कला की उस परंपरा को दर्शाता है जहाँ देह और मन का समन्वय सर्वोपरि है। यह न केवल सौंदर्यबोध को सुदृढ़ करता है बल्कि दर्शक और कलाकार के बीच भावनात्मक संबंध भी स्थापित करता है।

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