कुचिपुड़ी, एक यक्षगान शैली है जिसकी कल्पना सिद्धेंद्र योगी ने कब की थी?

कुचिपुड़ी, एक यक्षगान शैली है जिसकी कल्पना सिद्धेंद्र योगी ने कब की थी?
कुचिपुड़ी, एक यक्षगान शैली है जिसकी कल्पना सिद्धेंद्र योगी 17वीं शताब्दी में की थी। कुचिपुड़ी भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्य-नाट्य रूपों में से एक है जिसकी जड़ें दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में गहराई तक समाई हुई हैं। यह केवल एक नृत्य शैली नहीं बल्कि नृत्य, संगीत, अभिनय, कविता और नाट्य का समन्वित रूप है। ऐतिहासिक रूप से कुचिपुड़ी को यक्षगान परंपरा से विकसित एक नृत्य-नाट्य शैली माना जाता है। इसकी वैचारिक और कलात्मक कल्पना 17वीं शताब्दी में महान संत-कवि सिद्धेंद्र योगी ने की थी। कुचिपुड़ी की विशेषता यह है कि इसमें नृत्य और नाटक का अद्भुत मेल दिखाई देता है। मंच पर कलाकार न केवल नृत्य करते हैं बल्कि पात्र बनकर संवाद, गीत और अभिनय के माध्यम से कथा को जीवंत भी करते हैं। इसीलिए इसे पारंपरिक रूप से नृत्य-नाट्य कहा गया। कुचिपुड़ी का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ कुचिपुड़ी का नाम आंध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले के कुचेलापुरि (कुचिपुड़ी) नामक गाँव से जुड़ा माना जाता है। यही वह स्थान है जहाँ इस नृत्य-नाट्य परंपरा ने संगठित रूप लिया। 17वीं शताब्दी से पहले दक्षिण भारत में यक्षगान और भागवत मेला जैसी नाट्य प…