कुड नृत्य को समझना वस्तुतः जम्मू क्षेत्र के ग्रामीण समाज, उनकी धार्मिक मान्यताओं और प्रकृति के साथ उनके संबंध को समझना है। यह नृत्य सदियों से लोक जीवन का अभिन्न अंग रहा है और आज भी पारंपरिक उत्सवों व मेलों में पूरे उत्साह के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
कुड नृत्य की उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कुड नृत्य की उत्पत्ति प्राचीन काल से मानी जाती है। इसके इतिहास का कोई लिखित प्रमाण सीमित रूप में उपलब्ध है। किंतु लोक परंपराओं और मौखिक इतिहास के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कुड नृत्य का विकास ग्रामीण समाज की धार्मिक आवश्यकताओं और सामूहिक विश्वासों से हुआ।
प्राचीन समय में जब प्राकृतिक आपदाएँ, बीमारियाँ या अकाल जैसी समस्याएँ आती थीं तब लोग देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए सामूहिक अनुष्ठान करते थे। कुड नृत्य को भी इसी प्रकार का एक धार्मिक-आध्यात्मिक अनुष्ठानात्मक नृत्य माना जाता है। इसका उद्देश्य देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त करना और समाज में सुख-समृद्धि बनाए रखना था।
भौगोलिक क्षेत्र और सामाजिक परिवेश
कुड नृत्य मुख्य रूप से जम्मू क्षेत्र के पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों में प्रचलित है। यह क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से पर्वतीय है जहाँ जीवन सरल लेकिन संघर्षपूर्ण रहा है। यहाँ के लोग प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर रहे हैं। खेती, पशुपालन और वन संसाधनों पर आधारित जीवन शैली ने लोक संस्कृति को आकार दिया।
कुड नृत्य इसी सामाजिक परिवेश की उपज है। यह नृत्य सामूहिक रूप से किया जाता है जो ग्रामीण समाज की सामुदायिक भावना को दर्शाता है। इसमें जाति, वर्ग या आर्थिक भेदभाव की भूमिका नगण्य होती है; सभी लोग एक साथ मिलकर इस नृत्य में भाग लेते हैं।
धार्मिक महत्व
कुड नृत्य का धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। इसे प्रायः किसी देवी या देवता के सम्मान में किया जाता है। विशेष रूप से इसे ग्राम देवताओं और स्थानीय शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए आयोजित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि कुड नृत्य करने से:
- देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है
- रोग, आपदाओं और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है
- गाँव में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है
इस नृत्य का आयोजन कई बार मन्नत पूरी होने पर भी किया जाता है। जब किसी व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है तो वह गाँव के लोगों के साथ मिलकर कुड नृत्य का आयोजन करता है।
कुड नृत्य का समय और अवसर
कुड नृत्य का आयोजन किसी निश्चित मौसम तक सीमित नहीं है किंतु यह प्रायः:
- धार्मिक उत्सवों
- स्थानीय मेलों
- मंदिरों के वार्षिक आयोजनों
- विशेष सामाजिक अवसरों पर किया जाता है।
कई बार यह नृत्य पूरी रात चलता है जो इसे अन्य लोक नृत्यों से अलग बनाता है। रातभर चलने वाला यह नृत्य सामूहिक भक्ति और उत्साह का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
नृत्य की संरचना और शैली
कुड नृत्य की संरचना सरल लेकिन अत्यंत प्रभावशाली होती है। इसमें नर्तक गोलाकार या अर्धगोलाकार रूप में एकत्र होते हैं। नृत्य की गति धीरे-धीरे आरंभ होकर उत्साह के साथ तेज होती जाती है।
मुख्य विशेषताएँ
- सामूहिक नृत्य: इसमें व्यक्तिगत प्रदर्शन से अधिक सामूहिक भागीदारी पर जोर होता है।
- लयात्मक गति: नृत्य की चाल ढोल की ताल के अनुसार बदलती रहती है।
- सरल कदम: जटिल मुद्राओं के बजाय सरल लेकिन ऊर्जा से भरपूर कदम होते हैं।
- भावात्मक अभिव्यक्ति: नर्तकों के चेहरे पर भक्ति, उल्लास और समर्पण का भाव स्पष्ट दिखाई देता है।
संगीत और वाद्य यंत्र
कुड नृत्य का संगीत इसकी आत्मा है। इसके बिना नृत्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
प्रमुख वाद्य यंत्र
- ढोल – मुख्य ताल वाद्य
- नगाड़ा – गंभीर और गूंजदार ध्वनि के लिए
- शहनाई या बाँसुरी – कुछ क्षेत्रों में सहायक वाद्य के रूप में
ढोल की ताल नृत्य की गति को नियंत्रित करती है। जैसे-जैसे ताल तेज होती है नर्तकों की ऊर्जा और उत्साह भी बढ़ता जाता है।
गीत और मौखिक परंपरा
कुड नृत्य में गाए जाने वाले गीत प्रायः लोकभाषा में होते हैं। इनमें:
- देवी-देवताओं की स्तुति
- लोक कथाएँ
- सामाजिक मूल्य
- प्रकृति से जुड़े प्रतीक समाहित होते हैं।
ये गीत पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ते आए हैं जिससे इनका स्वरूप आज भी प्राचीन परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
वेशभूषा
कुड नृत्य की वेशभूषा साधारण लेकिन पारंपरिक होती है।
पुरुष प्रायः:
- धोती या पायजामा
- कुर्ता
- सिर पर पगड़ी या टोपी पहनते हैं।
महिलाएँ पारंपरिक परिधान और आभूषण धारण करती हैं। हालाँकि कुड नृत्य में महिलाओं की भागीदारी क्षेत्र विशेष पर निर्भर करती है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
कुड नृत्य केवल एक सांस्कृतिक गतिविधि नहीं है बल्कि यह सामाजिक एकता का माध्यम भी है। इसके माध्यम से:
- सामूहिक सहभागिता को बढ़ावा मिलता है
- पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद स्थापित होता है
- लोक परंपराओं का संरक्षण होता है
यह नृत्य गाँव के लोगों को एक सूत्र में बाँधता है और सामूहिक पहचान को मजबूत करता है।
कुड नृत्य और आधुनिक समय
आधुनिक समय में शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कई लोक नृत्य विलुप्ति के कगार पर हैं। कुड नृत्य भी इससे अछूता नहीं है। फिर भी:
- सांस्कृतिक संस्थाएँ
- राज्य स्तरीय उत्सव
- लोक कला मंच इसके संरक्षण और प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
शिक्षा और शोध में कुड नृत्य
आज कुड नृत्य पर लोक-संस्कृति विशेषज्ञों और इतिहासकारों द्वारा शोध किया जा रहा है। इसे:
- पाठ्यक्रमों में शामिल करने
- सांस्कृतिक कार्यशालाओं के माध्यम से सिखाने
- प्रलेखन (डॉक्यूमेंटेशन) के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि यह धरोहर सुरक्षित रह सके।
पर्यटन और कुड नृत्य
जम्मू और कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान में कुड नृत्य एक आकर्षक तत्व है। सांस्कृतिक पर्यटन के अंतर्गत यदि इसे सही मंच मिले तो:
- स्थानीय कलाकारों को रोजगार
- क्षेत्रीय संस्कृति का वैश्विक प्रचार
- आर्थिक विकास संभव है।
कुड नृत्य का भावनात्मक पक्ष
कुड नृत्य केवल शारीरिक गतिविधि नहीं है बल्कि यह भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव भी है। नर्तक जब रातभर ताल और भक्ति में डूबे रहते हैं तो यह एक सामूहिक साधना का रूप ले लेता है।
संरक्षण की आवश्यकता
आज आवश्यकता है कि:
- युवा पीढ़ी को कुड नृत्य से जोड़ा जाए
- डिजिटल माध्यमों से इसका प्रचार हो
- पारंपरिक गुरुओं और कलाकारों को सम्मान मिले
तभी यह लोक नृत्य आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह सकेगा।
