झिझिया नृत्य मुख्यतः महिलाओं द्वारा समूह में प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य वर्षा ऋतु और विशेष लोक अवसरों पर किया जाता है जब किसान मानसून की प्रतीक्षा में होते हैं या अच्छी बारिश के लिए देवताओं से प्रार्थना करते हैं। झिझिया नृत्य न केवल धार्मिक भावना से जुड़ा है बल्कि यह सामाजिक एकता, लोक कला और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतिनिधित्व करता है।
झिझिया नृत्य की उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
झिझिया नृत्य की उत्पत्ति बिहार के ग्रामीण समाज से जुड़ी मानी जाती है। इसका इतिहास लिखित रूप में सीमित है किंतु मौखिक परंपराओं और लोक कथाओं में इसके प्रमाण मिलते हैं। प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में इंद्र को वर्षा का देवता माना गया है। वैदिक काल में इंद्र को शक्ति, वर्षा और उर्वरता का देव माना गया जो बादल, बिजली और वर्षा को नियंत्रित करते हैं।
बिहार का समाज ऐतिहासिक रूप से कृषि पर आधारित रहा है। यहाँ धान, गेहूँ, मक्का और दलहन की खेती वर्षा पर निर्भर करती है। ऐसी परिस्थिति में वर्षा की अनिश्चितता ने लोक-जीवन में अनेक अनुष्ठानों और नृत्यों को जन्म दिया जिनमें झिझिया नृत्य प्रमुख है। यह नृत्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी महिलाओं द्वारा संरक्षित और आगे बढ़ाया गया।
झिझिया नृत्य का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
झिझिया नृत्य का मूल उद्देश्य इंद्र देव को प्रसन्न करना है ताकि वे समय पर और पर्याप्त वर्षा प्रदान करें। लोक विश्वास के अनुसार, यदि इंद्र प्रसन्न होते हैं तो धरती हरी-भरी रहती है, फसल अच्छी होती है और समाज में समृद्धि आती है।
इस नृत्य में महिलाएँ सिर पर झिझिया नामक मिट्टी का पात्र रखती हैं जिसमें छेद होते हैं और भीतर दीपक जलाया जाता है। यह जलता दीपक आस्था, प्रकाश और जीवन ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। दीपक का बुझना अशुभ माना जाता है। इसलिए नर्तकियाँ अत्यंत संतुलन और श्रद्धा के साथ नृत्य करती हैं।
झिझिया नृत्य का सामाजिक स्वरूप
झिझिया नृत्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक सामाजिक आयोजन भी है। इसमें गाँव की महिलाएँ एकत्र होकर सामूहिक रूप से नृत्य करती हैं। यह आयोजन सामाजिक एकता, सहयोग और सामूहिक प्रार्थना का प्रतीक है।
- नारी शक्ति का प्रतीक: यह नृत्य महिलाओं द्वारा किया जाता है जो परिवार और समाज में जीवनदायिनी शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- सामूहिकता: झिझिया नृत्य में व्यक्तिगत प्रदर्शन से अधिक समूह का महत्व होता है।
- लोक परंपरा का संरक्षण: यह नृत्य ग्रामीण जीवन में लोक संस्कृति को जीवित रखता है।
झिझिया नृत्य की प्रस्तुति शैली
झिझिया नृत्य की प्रस्तुति सरल लेकिन अत्यंत भावपूर्ण होती है।
नृत्य की मुद्रा और चाल
- महिलाएँ गोलाकार या पंक्तिबद्ध होकर धीमी, लयबद्ध चाल से नृत्य करती हैं। शरीर की गतियाँ संतुलित होती हैं क्योंकि सिर पर दीपक जलता रहता है। हाथों की कोमल मुद्राएँ प्रार्थना और विनय को दर्शाती हैं।
संगीत और ताल
- इस नृत्य में लोक गीत गाए जाते हैं जिनमें इंद्र देव से वर्षा की प्रार्थना की जाती है। ढोलक, मंजीरा, झांझ और कभी-कभी बाँसुरी जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता है। गीतों की भाषा सरल और ग्रामीण होती है।
वेशभूषा
- झिझिया नृत्य में महिलाएँ पारंपरिक बिहारी परिधान पहनती हैं:
- रंग-बिरंगी साड़ियाँ
- सिर पर घूँघट
- हाथों में चूड़ियाँ
- पैरों में पायल
वेशभूषा में सादगी और लोक रंगों की प्रधानता होती है।
झिझिया (मिट्टी का पात्र) का प्रतीकात्मक अर्थ
झिझिया नृत्य में प्रयुक्त मिट्टी का पात्र केवल एक वस्तु नहीं बल्कि गहरे प्रतीकात्मक अर्थ रखता है।
- मिट्टी: धरती माता का प्रतीक
- दीपक: जीवन, आशा और ऊर्जा
- छेददार पात्र: कठिन परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखने का संदेश
यह संदेश देता है कि जीवन में कठिनाइयों के बावजूद आस्था और संतुलन से आगे बढ़ा जा सकता है।
झिझिया नृत्य और कृषि जीवन
बिहार का ग्रामीण समाज कृषि पर निर्भर है। झिझिया नृत्य सीधे तौर पर कृषि जीवन से जुड़ा है। यह नृत्य किसानों की उस चिंता और आशा को व्यक्त करता है जो मानसून के आगमन से जुड़ी होती है।
- अच्छी बारिश = अच्छी फसल
- अच्छी फसल = समृद्ध समाज
इस प्रकार झिझिया नृत्य कृषि संस्कृति का अभिन्न अंग है।
झिझिया नृत्य में लोक गीतों की भूमिका
झिझिया नृत्य के गीत अत्यंत भावनात्मक होते हैं। इनमें प्रकृति, देवता और मानव जीवन का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। गीतों में कभी विनती, कभी उत्साह और कभी कृतज्ञता का भाव होता है।
इन गीतों के माध्यम से महिलाएँ अपनी सामूहिक भावना, पीड़ा और आशा को व्यक्त करती हैं। लोक गीत इस नृत्य की आत्मा हैं।
झिझिया नृत्य का सांस्कृतिक महत्व
झिझिया नृत्य बिहार की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह नृत्य ग्रामीण समाज की सादगी, आस्था और सामूहिक जीवन को दर्शाता है।
- यह लोक परंपरा को जीवित रखता है
- नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है
- क्षेत्रीय संस्कृति को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाता है
आधुनिक समय में झिझिया नृत्य
आधुनिक समय में शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कई लोक नृत्य विलुप्त होने की कगार पर हैं। फिर भी झिझिया नृत्य आज भी बिहार के कई ग्रामीण क्षेत्रों में जीवित है।
सरकारी और सांस्कृतिक संस्थाएँ इसे मंचीय प्रस्तुतियों, लोक महोत्सवों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से संरक्षित करने का प्रयास कर रही हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी इसे सांस्कृतिक अध्ययन का हिस्सा बनाया जा रहा है।
झिझिया नृत्य: परंपरा और परिवर्तन
हालाँकि झिझिया नृत्य अपनी मूल परंपरा में आज भी किया जाता है परंतु मंचीय प्रस्तुतियों में इसमें कुछ परिवर्तन देखने को मिलते हैं:
- संगीत में आधुनिक वाद्य यंत्र
- वेशभूषा में सजावटी तत्व
- प्रस्तुति की अवधि में बदलाव
फिर भी मूल भावना इंद्र देव को प्रसन्न करने की आस्था आज भी बनी हुई है।
झिझिया नृत्य और नारी सशक्तिकरण
झिझिया नृत्य महिलाओं को सामूहिक मंच प्रदान करता है। यह नृत्य दर्शाता है कि ग्रामीण समाज में महिलाएँ केवल गृहस्थी तक सीमित नहीं बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन की भी महत्वपूर्ण धुरी हैं। यह नृत्य महिलाओं में आत्मविश्वास, सामूहिकता और नेतृत्व की भावना को बढ़ाता है।
झिझिया नृत्य का भविष्य
लोक संस्कृति तभी जीवित रहती है जब समाज उसे अपनाए और आगे बढ़ाए। झिझिया नृत्य का भविष्य भी इस बात पर निर्भर करता है कि नई पीढ़ी इसे कितनी गंभीरता से अपनाती है। डिजिटल मीडिया, सांस्कृतिक उत्सव और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के माध्यम से झिझिया नृत्य को नई पहचान मिल सकती है।
