जंग की समस्या: लोहे का सबसे बड़ा शत्रु
जंग क्या है?
जंग एक रासायनिक-विद्युत रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें लोहा वातावरण की ऑक्सीजन और नमी के संपर्क में आकर लौह ऑक्साइड बनाता है। यह लाल-भूरे रंग का पदार्थ कमजोर, भुरभुरा और परतदार होता है।
जंग के दुष्परिणाम
- संरचनात्मक कमजोरी
- रखरखाव लागत में वृद्धि
- सुरक्षा जोखिम (पुल, रेल, इमारतें)
- सौंदर्य में कमी
इसीलिए लोहे को जंग से बचाने की तकनीकों की खोज हुई जैसे पेंटिंग, तेल-ग्रीस, मिश्रधातु और गैल्वनीकरण।
गैल्वनीकरण: परिभाषा और मूल अवधारणा
गैल्वनीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें लोहे या स्टील की सतह पर जिंक की पतली परत चढ़ाई जाती है ताकि उसे जंग से बचाया जा सके। यह परत दो तरह से सुरक्षा देती है:
- भौतिक अवरोध (Barrier Protection)
- कैथोडिक सुरक्षा (Sacrificial Protection)
जिंक ही क्यों?
जिंक के गुण
- ऑक्सीकरण की प्रवृत्ति लोहे से अधिक
- सस्ती और आसानी से उपलब्ध
- पर्यावरणीय दृष्टि से अपेक्षाकृत सुरक्षित
- अच्छी चिपकन और परत निर्माण क्षमता
- बलिदानी धातु की अवधारणा
जिंक को बलिदानी धातु (Sacrificial Metal) कहा जाता है क्योंकि यह स्वयं पहले ऑक्सीकृत होकर लोहे को बचाती है। यदि जिंक की परत कहीं से कट भी जाए तब भी जिंक पहले जंग खाएगा और लोहा सुरक्षित रहेगा।
गैल्वनीकरण का इतिहास
- 18वीं शताब्दी में जंग की समस्या गंभीर रूप से पहचानी गई
- 19वीं शताब्दी में जिंक लेपन की व्यावहारिक विधियाँ विकसित हुईं
- औद्योगिक क्रांति के बाद गैल्वनीकरण का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ
रेलवे, पुल, जहाज और भवन निर्माण में इसकी उपयोगिता ने इसे मानक तकनीक बना दिया।
गैल्वनीकरण की विधियाँ
हॉट-डिप गैल्वनीकरण
यह सबसे प्रचलित विधि है।
प्रक्रिया:
- लोहे की सतह की सफाई
- फ्लक्सिंग
- पिघले जिंक (लगभग 450°C) में डुबोना
- ठंडा करना
इससे मोटी और टिकाऊ परत बनती है।
इलेक्ट्रो-गैल्वनीकरण
- विद्युत अपघटन द्वारा जिंक की पतली परत
- अधिक चिकनी सतह
- अपेक्षाकृत कम टिकाऊ
- शेरार्डाइजिंग
- जिंक पाउडर के साथ बंद ड्रम में गर्म करना
- छोटे पुर्जों के लिए उपयोगी
- जिंक लेप की संरचना और परतें
गैल्वनीकृत लोहे पर जिंक की परत एक समान नहीं होती बल्कि कई मिश्रित परतें बनती हैं:
- γ (गामा) परत
- δ (डेल्टा) परत
- ζ (ज़ेटा) परत
- η (एटा) शुद्ध जिंक परत
ये परतें लोहे और जिंक के बीच मजबूत धात्विक बंधन बनाती हैं।
कैथोडिक सुरक्षा का सिद्धांत
जब गैल्वनीकृत लोहे की सतह पर खरोंच आती है:
- जिंक एनोड की तरह कार्य करता है
- लोहा कैथोड बन जाता है
- जिंक ऑक्सीकृत होकर स्वयं नष्ट होता है
- लोहा सुरक्षित रहता है
यही कारण है कि पेंट की तुलना में गैल्वनीकरण अधिक प्रभावी है।
गैल्वनीकृत लोहे के गुण
- उच्च जंग प्रतिरोध
- लंबी आयु (20–50 वर्ष तक)
- कम रखरखाव
- यांत्रिक मजबूती
- मौसम और रसायनों के प्रति सहनशीलता
औद्योगिक और दैनिक जीवन में उपयोग
निर्माण क्षेत्र
- छत की चादरें
- पाइप
- पुल और खंभे
कृषि
- तार जाल
- पानी के टैंक
- उपकरण
परिवहन
- वाहन बॉडी
- रेल पटरियाँ
- कंटेनर
घरेलू उपयोग
- बाल्टियाँ
- अलमारी
- फर्नीचर फ्रेम
पर्यावरणीय और आर्थिक दृष्टि
पर्यावरण लाभ
- कम बार प्रतिस्थापन
- संसाधनों की बचत
- पुनर्चक्रण योग्य
आर्थिक लाभ
- दीर्घकालीन लागत में कमी
- कम रखरखाव
- संरचनाओं की विश्वसनीयता
गैल्वनीकरण बनाम पेंटिंग — संक्षिप्त तुलना
लोहे को जंग से बचाने के लिए गैल्वनीकरण और पेंटिंग दो प्रमुख विधियाँ अपनाई जाती हैं। दोनों का उद्देश्य समान है पर उनकी प्रभावशीलता और दीर्घकालिक परिणाम अलग-अलग होते हैं।
गैल्वनीकरण में लोहे पर जिंक का लेप चढ़ाया जाता है जो न केवल सतह को ढकता है बल्कि बलिदानी सुरक्षा भी देता है। यदि सतह पर खरोंच आ जाए तब भी जिंक पहले ऑक्सीकृत होकर लोहे को सुरक्षित रखता है। इसी कारण इसकी सुरक्षा अवधि लंबी, रखरखाव न्यूनतम और दीर्घकालिक लागत कम होती है।
वहीं पेंटिंग केवल एक बाहरी परत प्रदान करती है। खरोंच या परत के टूटते ही लोहा सीधे वातावरण के संपर्क में आ जाता है और जंग लगने लगती है। इसलिए पेंटिंग की सुरक्षा अवधि कम, रखरखाव अधिक और दीर्घकालिक लागत अधिक होती है।
सीमाएँ और सावधानियाँ
- अत्यधिक अम्लीय वातावरण में जिंक तेजी से घुल सकता है
- उच्च तापमान पर जिंक परत प्रभावित हो सकती है
- खाद्य संपर्क में विशेष मानकों की आवश्यकता
