मानव शरीर में रक्त का थक्का नहीं बनने का प्रमुख कारण क्या है?

मानव शरीर में रक्त का थक्का नहीं बनने का प्रमुख कारण हिपेरिन की उपस्थिति है। मानव शरीर में रक्त का प्रवाह जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। रक्त न केवल ऑक्सीजन और पोषक तत्त्वों को अंगों तक पहुँचाता है बल्कि अपशिष्ट पदार्थों को हटाने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने और ताप-नियंत्रण जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य भी करता है। सामान्य परिस्थितियों में रक्त तरल अवस्था में रहता है किंतु चोट लगने पर उसका थक्का बनना (रक्तस्राव रोकने के लिए) उतना ही आवश्यक है। इस संतुलन जहाँ रक्त आवश्यक होने पर जमे और शेष समय तरल बना रहे को बनाए रखने में कई जैव-रासायनिक घटक मिलकर काम करते हैं। इन्हीं में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक एण्टीकोएगुलेंट (रक्त-थक्का-रोधी) पदार्थ है हिपेरिन।

मानव शरीर में रक्त का थक्का नहीं बनने का प्रमुख कारण हिपेरिन की उपस्थिति है।

रक्त का थक्का बनना: परिचय

रक्त का थक्का बनना (Blood Coagulation) एक जटिल, बहु-चरणीय प्रक्रिया है जिसे क्लॉटिंग कैस्के* कहा जाता है। इस प्रक्रिया में कई क्लॉटिंग फैक्टर्स (जैसे फैक्टर I से XIII तक) क्रमिक रूप से सक्रिय होते हैं। मुख्य चरण संक्षेप में इस प्रकार हैं:
  • वेसोकंस्ट्रिक्शन: चोट लगते ही रक्त वाहिका सिकुड़ती है।
  • प्लेटलेट प्लग का निर्माण: प्लेटलेट्स क्षतिग्रस्त स्थान पर चिपककर अस्थायी प्लग बनाते हैं।
  • कोएगुलेशन कैस्केड: थ्रोम्बिन का निर्माण होता है जो फाइब्रिनोजन को फाइब्रिन में बदल देता है।
  • स्थायी थक्का: फाइब्रिन जाल प्लेटलेट प्लग को मजबूत कर स्थायी थक्का बनाता है।
यदि यह प्रक्रिया अनियंत्रित हो जाए तो रक्त वाहिकाओं में अनावश्यक थक्के (थ्रोम्बोसिस) बन सकते हैं जो जानलेवा हो सकते हैं। इसलिए शरीर में थक्का-रोधी तंत्र भी उतना ही आवश्यक है।

एण्टीकोएगुलेंट तंत्र का महत्व

मानव शरीर में रक्त को तरल बनाए रखने के लिए कई प्राकृतिक एण्टीकोएगुलेंट मौजूद हैं जैसे:
  • एण्टीथ्रोम्बिन III
  • प्रोटीन C और प्रोटीन S
  • टिशू फैक्टर पाथवे इन्हिबिटर
  • हिपेरिन
इन सभी में हिपेरिन विशेष रूप से प्रभावी और त्वरित कार्य करने वाला पदार्थ है। यही कारण है कि इसे शरीर का प्राकृतिक “रक्त-थक्का-रोधी रक्षक” कहा जाता है।

हिपेरिन क्या है?

हिपेरिन एक सल्फेटेड म्यूकोपॉलीसैकराइड (Sulfated Glycosaminoglycan) है। यह अत्यधिक ऋणावेशित (Negatively charged) अणु होता है जो कई प्रोटीनों के साथ संयोग कर उनकी क्रियाशीलता को प्रभावित करता है। हिपेरिन की खोज 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में हुई थी और बाद में इसे चिकित्सकीय उपयोग के लिए भी विकसित किया गया।

रासायनिक संरचना

  • यह मुख्यतः ग्लूकोसामीन और यूरोनिक एसिड की पुनरावृत्त इकाइयों से बना होता है।
  • सल्फेट समूहों की अधिकता इसे अत्यधिक नकारात्मक आवेश प्रदान करती है।
  • यही नकारात्मक आवेश एण्टीकोएगुलेंट क्रिया के लिए निर्णायक होता है।

हिपेरिन का निर्माण और भंडारण

मानव शरीर में हिपेरिन का निर्माण मुख्यतः
  • मास्ट कोशिकाओं (Mast Cells)
  • कुछ हद तक बेसोफिल्स (Basophils) में होता है।
ये कोशिकाएँ:
  • यकृत
  • फेफड़े
  • त्वचा
  • आँतों की श्लेष्मा परत में अधिक पाई जाती हैं।
मास्ट कोशिकाओं के ग्रैन्यूल्स में हिपेरिन संग्रहित रहता है और आवश्यकता पड़ने पर यह रक्त में मुक्त हो जाता है।

हिपेरिन और एण्टीथ्रोम्बिन III का संबंध

हिपेरिन स्वयं सीधे सभी क्लॉटिंग फैक्टर्स को निष्क्रिय नहीं करता बल्कि यह एण्टीथ्रोम्बिन III नामक प्रोटीन की क्रिया को कई गुना बढ़ा देता है।
  • एण्टीथ्रोम्बिन ीी:
  • थ्रोम्बिन
  • फैक्टर Xa
  • फैक्टर IXa
  • फैक्टर XIa जैसे सक्रिय क्लॉटिंग फैक्टर्स को निष्क्रिय करता है।
हिपेरिन एण्टीथ्रोम्बिन III के साथ जुड़कर उसकी संरचना में परिवर्तन करता है जिससे वह इन क्लॉटिंग फैक्टर्स को अधिक तेज़ी और प्रभावशीलता से निष्क्रिय कर पाता है।

हिपेरिन द्वारा थक्का-निर्माण की रोकथाम की प्रक्रिया

हिपेरिन की उपस्थिति में:
  • थ्रोम्बिन का निर्माण रुकता है।
  • फाइब्रिनोजन → फाइब्रिन का परिवर्तन बाधित होता है।
  • पहले से बने छोटे थक्के बढ़ नहीं पाते।
इस प्रकार हिपेरिन थक्का बनने की पूरी शृंखला को धीमा या रोक देता है जिससे रक्त तरल अवस्था में बना रहता है।

शरीर में रक्त का थक्का न बनने के प्रमुख कारणों में हिपेरिन

अब यह स्पष्ट होता है कि:
  • सामान्य परिसंचरण में रक्त का न जमना
  • रक्त वाहिकाओं के भीतर थ्रोम्बोसिस का न होना
इन दोनों के पीछे हिपेरिन की सतत उपस्थिति और क्रियाशीलता एक प्रमुख कारण है। यदि हिपेरिन न हो तो हल्की-सी उत्तेजना पर भी रक्त जमने लगेगा जिससे हृदयाघात, स्ट्रोक और फेफड़ों में एम्बोलिज़्म जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

हिपेरिन और अन्य एण्टीकोएगुलेंट्स की तुलना

यद्यपि शरीर में कई एण्टीकोएगुलेंट तंत्र हैं पर:
  • हिपेरिन तेज़ है
  • इसका प्रभाव प्रत्यक्ष और शक्तिशाली है
  • यह आपात स्थितियों में तुरंत कार्य करता है
इसी कारण चिकित्सकीय उपयोग में भी हिपेरिन को विशेष स्थान प्राप्त है।

चिकित्सकीय दृष्टि से हिपेरिन का महत्व

हिपेरिन का उपयोग:
  • गहरी शिरा घनास्त्रता (DVT)
  • फुफ्फुसीय एम्बोलिज़्म
  • हृदय शल्य चिकित्सा
  • डायलिसिस
  • एन्जाइना और हृदयाघात जैसी स्थितियों में किया जाता है।
यह इस तथ्य को और पुष्ट करता है कि मानव शरीर में रक्त का थक्का न बनने की प्राकृतिक व्यवस्था में हिपेरिन की भूमिका कितनी केंद्रीय है।

हिपेरिन की कमी या अधिकता के प्रभाव

कमी

यदि शरीर में हिपेरिन की क्रिया कम हो जाए:
  • रक्त में थक्के बनने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है
  • थ्रोम्बोसिस का जोखिम बढ़ता है

अधिकता

अत्यधिक हिपेरिन:
  • अत्यधिक रक्तस्राव
  • चोट लगने पर देर से थक्का बनना का कारण बन सकता है।
इससे स्पष्ट है कि हिपेरिन का संतुलन अत्यंत आवश्यक है।

प्राकृतिक संतुलन और जीवन-रक्षा

मानव शरीर एक अद्भुत जैविक प्रणाली है जहाँ हर तत्त्व का संतुलित योगदान जीवन को सुरक्षित रखता है। हिपेरिन:
  • अनावश्यक थक्का-निर्माण से रक्षा करता है
  • रक्त प्रवाह को सुचारु रखता है
  • हृदय और मस्तिष्क जैसे संवेदनशील अंगों की सुरक्षा करता है

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