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ढिम्सा नृत्य की उत्पत्ति और क्षेत्र
ढिम्सा नृत्य का उद्भव आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम ज़िले की सुरम्य अराकू घाटी से जुड़ा है। यह क्षेत्र पहाड़ियों, हरियाली और जनजातीय बस्तियों के लिए प्रसिद्ध है। पोरजा जनजाति के साथ-साथ आसपास की कुछ अन्य जनजातियाँ भी इस नृत्य को अपनाती हैं किंतु इसका मूल स्वरूप पोरजा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान माना जाता है।
नृत्य की विशेषताएँ
ढिम्सा एक सामूहिक नृत्य है जिसमें पुरुष और महिलाएँ वृत्ताकार या अर्धवृत्ताकार रूप में एक साथ नृत्य करते हैं। नृत्य की गतियाँ सरल, लयबद्ध और तालमेल से भरी होती हैं जो समुदाय की एकता और सहयोग की भावना को दर्शाती हैं। नर्तक एक-दूसरे के कंधों या कमर को पकड़कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए ताल पर कदम मिलाते हैं।
वेशभूषा और वाद्य यंत्र
ढिम्सा नृत्य में जनजातीय वेशभूषा का विशेष महत्व है। पुरुष पारंपरिक धोती, कमरबंद और सिर पर पगड़ी या कपड़ा बाँधते हैं जबकि महिलाएँ रंगीन साड़ियाँ, चाँदी के आभूषण और पारंपरिक गहने धारण करती हैं। नृत्य के साथ ढोल, ताशा, मोरचंग और अन्य लोक वाद्य बजाए जाते हैं जिनकी थाप नृत्य में ऊर्जा भर देती है।
अवसर और सामाजिक महत्व
ढिम्सा नृत्य विशेष रूप से फसल कटाई, त्योहारों, विवाह और सामुदायिक उत्सवों के अवसर पर किया जाता है। यह नृत्य जनजातीय समाज में आपसी मेल-जोल, आनंद और सामूहिक सहभागिता को बढ़ावा देता है। इसके माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने का कार्य भी होता है।
सांस्कृतिक विरासत में ढिम्सा का स्थान
ढिम्सा लोक नृत्य पोरजा जनजाति की सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य हिस्सा है। आज यह नृत्य जनजातीय सीमाओं से बाहर निकलकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक मंचों पर भी प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे अराकू घाटी और आंध्र प्रदेश की लोक संस्कृति को व्यापक पहचान मिल रही है।
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