अवध रियासत: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
अवध उत्तर भारत की एक समृद्ध ऐतिहासिक रियासत थी जिसकी राजधानी लखनऊ रही। यह क्षेत्र कला, संगीत, साहित्य और शिष्टाचार के लिए प्रसिद्ध था। मुग़ल परंपराओं और स्थानीय भारतीय तत्वों के संगम से यहाँ एक विशिष्ट नवाबी तहज़ीब विकसित हुई।
भौगोलिक और राजनीतिक परिदृश्य
अवध की सीमाएँ गंगा–यमुना के दोआब से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक फैली थीं। 18वीं–19वीं शताब्दी में नवाबों के शासनकाल में लखनऊ सांस्कृतिक राजधानी बन गया। दरबारों में कव्वाली, ठुमरी, दादरा, ग़ज़ल और कथक जैसी कलाओं को संरक्षण मिला।
कथक नृत्य: उत्पत्ति और प्रारंभिक स्वरूप
कथक शब्द ‘कथा’ से बना है जिसका अर्थ है कहानी। प्रारंभिक काल में कथक कथावाचकों द्वारा मंदिरों में धार्मिक कथाएँ सुनाने–दिखाने की परंपरा से जुड़ा था। हाथों की मुद्राएँ, पैरों की ताल और चेहरे के भावों से कथा का संप्रेषण किया जाता था।
मंदिर से दरबार तक की यात्रा
भक्ति आंदोलन के दौर में कथक मंदिरों में लोकप्रिय था किंतु मध्यकाल में यह दरबारी कला के रूप में विकसित हुआ। इस परिवर्तन में अवध रियासत का योगदान निर्णायक रहा। यहाँ कथक ने शास्त्रीय अनुशासन के साथ दरबारी सौंदर्य और नफ़ासत का रूप ग्रहण किया।
अवध और कथक का घनिष्ठ संबंध
अवध रियासत को कथक का प्रमुख केंद्र मानने के कई ठोस कारण हैं जैसे राजाश्रय, सांस्कृतिक वातावरण, संगीत–नृत्य का समन्वय और कलाकारों का संरक्षण।
राजाश्रय और नवाबी संरक्षण
अवध के नवाब स्वयं कला–प्रेमी थे। वे संगीत, नृत्य और साहित्य के संरक्षक थे। नवाबी दरबारों में कथक नर्तकों को सम्मान, आजीविका और मंच मिलता था। यह संरक्षण कथक के तकनीकी और सौंदर्यात्मक विकास के लिए अनिवार्य सिद्ध हुआ।
लखनऊ घराने का उद्भव
कथक के तीन प्रमुख घराने लखनऊ, जयपुर और बनारस माने जाते हैं। इनमें लखनऊ घराना अवध रियासत की देन है। इस घराने की विशेषता है लास्य, नज़ाकत, भाव–अभिनय और ठुमरी–दादरा से गहरा संबंध।
नवाब वाजिद अली शाह और कथक
अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह कथक के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं। वे स्वयं संगीतज्ञ, कवि और नर्तक थे।
कला–प्रेमी शासक
वाजिद अली शाह ने कथक को केवल संरक्षण ही नहीं दिया बल्कि स्वयं इसके अभ्यास और प्रस्तुति में रुचि ली। उनके दरबार में कथक नर्तकों की विशेष प्रतिष्ठा थी। उन्होंने नृत्य नाटिकाएँ, रास और ठुमरी आधारित प्रस्तुतियाँ प्रोत्साहित कीं।
रंग महल और क़ैसरबाग
लखनऊ के रंग महल और क़ैसरबाग जैसे स्थलों पर नियमित कथक प्रस्तुतियाँ होती थीं। यहाँ कथक ने भाव–प्रधान और अभिव्यंजक शैली का सघन विकास किया।
लखनऊ: कथक की सांस्कृतिक राजधानी
लखनऊ केवल अवध की राजधानी नहीं बल्कि कथक की आत्मा बन गया। यहाँ की गंगा–जमुनी तहज़ीब ने कथक को शालीनता, सौम्यता और रसात्मकता प्रदान की।
संगीत और नृत्य का संगम
लखनऊ में कथक का विकास ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल के साथ हुआ। भाव–अभिनय (अभिव्यक्ति) पर विशेष बल दिया गया। नर्तक केवल ताल नहीं बल्कि भावों की कथा भी प्रस्तुत करता है।
वस्त्र, आभूषण और मंच सज्जा
लखनऊ शैली में परिधान अंगरखा, पाजामा, दुपट्टा और सादे किंतु सुरुचिपूर्ण आभूषणों का प्रयोग होता है। यह सब दरबारी सौंदर्यबोध का प्रतिबिंब है।
अवध में कथक की तकनीकी विशेषताएँ
अवध रियासत में विकसित कथक की कुछ विशिष्ट तकनीकी विशेषताएँ हैं:
- लास्य प्रधानता – कोमल, गोलाकार गतियाँ
- अभिनय पर बल – चेहरे, आँखों और भौंहों से भाव संप्रेषण
- ठुमरी–आधारित प्रस्तुति – श्रृंगार और भक्ति रस का सुंदर समन्वय
- नफ़ासत भरी चाल – दरबारी शिष्टाचार का प्रभाव
सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
अवध की सामाजिक संरचना ने कथक को एक परिष्कृत कला बनाया। तवायफ़ संस्कृति, महफ़िलें और मुशायरे इन सबने कथक के भावात्मक पक्ष को समृद्ध किया।
तवायफ़ों की भूमिका
नवाबी काल में तवायफ़ें संगीत और नृत्य की शिक्षित कलाकार होती थीं। उन्होंने कथक के अभिनय, ठुमरी और भाव–प्रस्तुति को उच्च स्तर तक पहुँचाया। यह पक्ष आज ऐतिहासिक अध्ययन में विशेष महत्व रखता है।
औपनिवेशिक काल और कथक
1857 के बाद अवध का नवाबी शासन समाप्त हुआ किंतु कथक की परंपरा जीवित रही। अंग्रेज़ी शासन के दौरान दरबारी संरक्षण घटा परंतु गुरुओं और घरानों ने इस कला को आगे बढ़ाया।
पुनरुत्थान का दौर
20वीं शताब्दी में संस्थागत शिक्षा और मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से कथक का पुनरुत्थान हुआ। लखनऊ घराने की शैली ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई।
आधुनिक काल में अवध की कथक विरासत
आज भी लखनऊ कथक का प्रमुख केंद्र है। गुरुकुल परंपरा, अकादमियाँ और महोत्सव इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं। आधुनिक कथक में भी लखनऊ शैली की नज़ाकत और अभिव्यक्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
वैश्विक पहचान
अवध से विकसित कथक आज विश्व मंचों पर प्रस्तुत किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय कलाकार भी लखनऊ घराने की शैली सीखने आते हैं।
