सामान्य रूप से यह माना जाता है कि मुगल सम्राट जहाँगीर ने अपने विद्रोही पुत्र शहजादा खुसरो को आश्रय और आशीर्वाद देने के आरोप में गुरु अर्जुन देव को मृत्युदण्ड दिया। यह घटना केवल एक व्यक्ति के दण्ड तक सीमित नहीं थी बल्कि इसने सिख–मुगल संबंधों की दिशा बदल दी और सिख समुदाय के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत की।
मुगल साम्राज्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि
मुगल साम्राज्य अपने चरम पर पहुँच चुका था। अकबर के शासनकाल में साम्राज्य को स्थिरता, धार्मिक सहिष्णुता और प्रशासनिक मजबूती मिली थी। किंतु अकबर की मृत्यु के बाद सत्ता का उत्तराधिकार सहज नहीं रहा। जहाँगीर के शासन की शुरुआत से ही दरबार में असंतोष, षड्यंत्र और सत्ता संघर्ष के बीज मौजूद थे।
जहाँगीर, जो स्वभाव से अकबर की तुलना में अधिक कट्टर और संदेहशील था वह अपने शासन को सुरक्षित रखने के लिए किसी भी संभावित चुनौती को कठोरता से कुचलना चाहता था।
शहजादा खुसरो का विद्रोह
शहजादा खुसरो जहाँगीर का सबसे बड़ा पुत्र था। अकबर के जीवनकाल में ही उसे उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाने लगा था। अकबर की मृत्यु के पश्चात जब जहाँगीर सम्राट बना तब खुसरो ने स्वयं को उपेक्षित और अन्यायग्रस्त महसूस किया।
विद्रोह के कारण
- दरबारी गुटबाज़ी
- खुसरो के समर्थकों की महत्त्वाकांक्षा
- जहाँगीर की नीतियों से असंतोष
- सत्ता में शीघ्र आने की लालसा
इन्हीं कारणों से खुसरो ने 1606 ई. में अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह असफल रहा और खुसरो को भागना पड़ा।
गुरु अर्जुन देव का व्यक्तित्व और कार्य
गुरु अर्जुन देव सिख परंपरा के अत्यंत महत्त्वपूर्ण गुरु थे। उनके कार्य केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी थे।
सिख धर्म में योगदान
- आदि ग्रंथ (गुरु ग्रंथ साहिब का प्रारंभिक संकलन) का संकलन
- अमृतसर में हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) का विकास
- सभी जातियों और वर्गों के लिए समानता का संदेश
गुरु अर्जुन देव की लोकप्रियता और प्रभाव पंजाब क्षेत्र तक सीमित नहीं था। उनके अनुयायी दूर-दूर तक फैले हुए थे।
खुसरो और गुरु अर्जुन देव का संपर्क
इतिहासकारों के अनुसार जब खुसरो विद्रोह के बाद पंजाब क्षेत्र से गुज़रा तब उसने गुरु अर्जुन देव से भेंट की। इस भेंट के स्वरूप को लेकर इतिहास में मतभेद हैं।
पारंपरिक मान्यता
- गुरु अर्जुन देव ने खुसरो को मानवीय आधार पर भोजन और विश्राम दिया
- उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया जो एक धार्मिक परंपरा का अंग था
मुगल दृष्टिकोण
- जहाँगीर की दृष्टि में यह आशीर्वाद राजनीतिक समर्थन के समान था। उसे लगा कि गुरु अर्जुन देव खुसरो के विद्रोह को नैतिक और धार्मिक समर्थन दे रहे हैं।
जहाँगीर की आत्मकथा और दृष्टिकोण
जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-जहाँगीरी में गुरु अर्जुन देव का उल्लेख किया है। उसने स्पष्ट लिखा कि:
- “गुरु अर्जुन लोगों को भ्रमित कर रहा था और खुसरो का पक्ष ले रहा था।”
यहीं से यह स्पष्ट होता है कि जहाँगीर गुरु अर्जुन देव को केवल एक धार्मिक नेता नहीं बल्कि संभावित राजनीतिक खतरे के रूप में देखता था।
गुरु अर्जुन देव की गिरफ़्तारी
जहाँगीर ने गुरु अर्जुन देव को गिरफ़्तार करवाया। उन पर आरोप लगाए गए:
- विद्रोही खुसरो को समर्थन देने का
- राज्य के विरुद्ध जनमत तैयार करने का
- इस्लाम विरोधी गतिविधियों का
हालाँकि इन आरोपों के ठोस प्रमाण नहीं थे फिर भी शाही आदेश सर्वोपरि था।
मृत्युदण्ड और यातनाएँ
गुरु अर्जुन देव को अत्यंत अमानवीय यातनाएँ दी गईं। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार:
- उन्हें गर्म तवे पर बैठाया गया
- उनके शरीर पर जलता हुआ रेत डाला गया
- उन्हें लगातार अपमानित किया गया
इन सभी यातनाओं के बावजूद गुरु अर्जुन देव शांत, धैर्यवान और आध्यात्मिक दृढ़ता से परिपूर्ण रहे।
शहादत का ऐतिहासिक महत्व
1606 ई. में गुरु अर्जुन देव ने प्राण त्याग दिए। यह घटना सिख इतिहास की पहली शहादत थी।
सिख परंपरा में प्रभाव
- सिख धर्म में संघर्ष और आत्मरक्षा की चेतना का विकास
- गुरु हरगोबिंद द्वारा मिरी–पीरी की अवधारणा
- सिख समुदाय का सैन्यीकरण
यह शहादत सिखों को केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी संगठित करने का कारण बनी।
धार्मिक बनाम राजनीतिक कारण
यह प्रश्न आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय है कि गुरु अर्जुन देव को मृत्युदण्ड धार्मिक कारणों से दिया गया या राजनीतिक।
निष्कर्षात्मक दृष्टि
- खुसरो को दिया गया आश्रय मुख्य तात्कालिक कारण था
- वास्तविक कारण जहाँगीर की राजनीतिक असुरक्षा थी
- गुरु अर्जुन देव की बढ़ती लोकप्रियता भी एक कारक थी
इस प्रकार यह घटना धर्म और राजनीति के जटिल अंतर्संबंध का परिणाम थी।
सिख–मुगल संबंधों में परिवर्तन
गुरु अर्जुन देव की शहादत के बाद:
- सिखों और मुगलों के बीच विश्वास टूट गया
- सिख गुरुओं ने आत्मरक्षा को आवश्यक माना
- आगे चलकर गुरु तेग बहादुर और गुरु गोबिंद सिंह के काल में संघर्ष और तीव्र हुआ
