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कथक की उत्पत्ति और संगीत परंपरा
कथक की उत्पत्ति प्राचीन कथाकार परंपरा से मानी जाती है जहाँ कथावाचक संगीत और ताल के साथ पौराणिक कथाएँ सुनाते थे। उत्तर भारत में विकसित हुए इस नृत्य रूप ने समय के साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की रागात्मक और तालात्मक संरचना को आत्मसात किया। परिणामस्वरूप कथक एक ऐसा नृत्य बन गया जिसमें संगीत केवल संगत नहीं बल्कि नृत्य का आधार है।
राग और भाव का समन्वय
कथक नृत्य में प्रस्तुति प्रायः हिंदुस्तानी रागों पर आधारित होती है। रागों के माध्यम से शृंगार, वीर, करुण, भक्ति जैसे रसों की अभिव्यक्ति की जाती है। नर्तक अपने भाव, नेत्राभिनय और अंग संचालन द्वारा संगीत की सूक्ष्मताओं को दृश्य रूप प्रदान करता है जिससे नृत्य और संगीत एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
ताल और लय की प्रधानता
कथक की आत्मा ताल में बसती है। इसमें हिंदुस्तानी संगीत की प्रमुख तालें जैसे तीनताल, एकताल, झपताल और दादरा का व्यापक प्रयोग होता है। पैरों में बँधे घुंघरुओं की लयात्मक ध्वनि तबले की थाप के साथ संवाद करती है। यह जुगलबंदी कथक को अन्य नृत्य शैलियों से अलग पहचान देती है।
वाद्य यंत्रों की भूमिका
कथक नृत्य के साथ प्रयुक्त वाद्य यंत्र भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत परंपरा से जुड़े होते हैं। तबला, पखावज, सारंगी, सितार और हारमोनियम जैसे वाद्य नृत्य को भावात्मक गहराई प्रदान करते हैं। विशेष रूप से तबला और घुंघरू के बीच होने वाला संवाद कथक की विशिष्ट पहचान है।
गायन शैलियाँ और कथक
कथक में ठुमरी, दादरा, कवित्त और भजन जैसी हिंदुस्तानी गायन शैलियों का प्रयोग किया जाता है। ठुमरी के माध्यम से कोमल भावों और शृंगार रस की अभिव्यक्ति होती है जबकि कवित्त और तराना नृत्य में ऊर्जा और गति भरते हैं।
