पोलियो रोग का परिचय
पोलियोमाइलाइटिस जिसे सामान्यतः पोलियो कहा जाता है एक वायरस जनित संक्रामक रोग है। यह रोग मुख्यतः बच्चों को प्रभावित करता है और कई मामलों में शरीर में स्थायी लकवा (Paralysis) उत्पन्न कर देता है।
पोलियो के प्रमुख लक्षण
- बुखार
- सिरदर्द
- मांसपेशियों में दर्द
- गर्दन में अकड़न
- हाथ या पैर में कमजोरी
- गंभीर अवस्था में स्थायी अपंगता
कुछ मामलों में यह रोग श्वसन मांसपेशियों को प्रभावित करता है जिससे मृत्यु तक हो सकती है।
पोलियो वायरस की प्रकृति
पोलियो रोग पोलियोवायरस के कारण होता है जो एंटरोवायरस समूह से संबंधित है। यह वायरस मुख्यतः दूषित पानी और भोजन के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है। पोलियोवायरस के तीन प्रमुख प्रकार माने जाते हैं:
टाइप-1
टाइप-2
टाइप-3
इनमें से टाइप-1 सबसे अधिक घातक और व्यापक रूप से फैलने वाला माना जाता है।
पोलियो का सामाजिक और ऐतिहासिक प्रभाव
20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में पोलियो ने अमेरिका, यूरोप और एशिया के अनेक देशों में महामारी का रूप धारण कर लिया था।
- हजारों बच्चे अपंग हो गए
- अस्पतालों में “आयरन लंग” मशीनों की कतारें लग गईं
- माता-पिता में भय और असुरक्षा का माहौल था
पोलियो केवल एक बीमारी नहीं बल्कि सामाजिक त्रासदी बन चुका था।
पोलियो टीके की आवश्यकता
बार-बार फैलने वाली पोलियो महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि:
- “यदि इस रोग को नियंत्रित करना है तो प्रभावी और सुरक्षित टीका अनिवार्य है।”
यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें पोलियो के टीके पर वैज्ञानिक अनुसंधान तेज़ हुआ।
जोन्स साल्क: जीवन परिचय
जोन्स एडवर्ड साल्क का जन्म 28 अक्टूबर 1914 को अमेरिका में हुआ था।
- वे एक कुशल वायरोलॉजिस्ट थे
- उन्होंने चिकित्सा अनुसंधान को मानव सेवा का माध्यम माना
- उनका विश्वास था कि विज्ञान का उद्देश्य लाभ नहीं बल्कि मानव कल्याण है
यही दृष्टिकोण आगे चलकर उन्हें विश्व इतिहास में अमर बना गया।
साल्क का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
उस समय अधिकांश वैज्ञानिक मानते थे कि जीवित लेकिन कमजोर वायरस से ही प्रभावी टीका बनाया जा सकता है। परंतु साल्क ने एक भिन्न मार्ग अपनाया:
- उन्होंने मृत (Killed) पोलियोवायरस का उपयोग करने का निर्णय लिया
- उनका तर्क था कि इससे टीका अधिक सुरक्षित होगा
यह निर्णय साहसिक था और प्रारंभ में कई वैज्ञानिकों ने इसकी आलोचना भी की।
पोलियो टीके का विकास
जोन्स साल्क ने वर्षों तक प्रयोगशाला में अनुसंधान किया।
- विभिन्न पोलियोवायरस स्ट्रेन पर अध्ययन
- फॉर्मेलिन से वायरस को निष्क्रिय करना
- मानव शरीर में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का परीक्षण
अंततः उन्होंने एक ऐसा टीका विकसित किया जो:
- रोग उत्पन्न नहीं करता था
- शरीर में एंटीबॉडी बनाने में सक्षम था
1954–55 का ऐतिहासिक परीक्षण:
- साल्क के टीके का सबसे बड़ा परीक्षण 1954 में किया गया।
- लगभग 18 लाख बच्चों पर परीक्षण
- इसे इतिहास का सबसे बड़ा मेडिकल ट्रायल माना जाता है
1955 में परिणाम घोषित हुए:
- “साल्क का पोलियो टीका सुरक्षित और प्रभावी है।”
यह घोषणा चिकित्सा विज्ञान में क्रांति के समान थी।
पोलियो का पहला प्रभावी टीका:
1955 में औपचारिक रूप से यह स्वीकार किया गया कि:
- पोलियो का पहला सफल टीका जोन्स साल्क ने तैयार किया था।
यह टीका इंजेक्शन के रूप में दिया जाता था और इसे Inactivated Polio Vaccine (IPV) कहा गया।
साल्क का मानवीय दृष्टिकोण
जब एक पत्रकार ने साल्क से पूछा:
- “इस टीके का पेटेंट किसके पास है?”
तो साल्क ने उत्तर दिया:
- “क्या आप सूर्य का पेटेंट ले सकते हैं?
उन्होंने टीके को मानवता की धरोहर मानते हुए उस पर कोई पेटेंट नहीं कराया। यह वैज्ञानिक नैतिकता का एक अद्भुत उदाहरण है।
साल्क बनाम सेबिन: एक तुलना
पोलियो उन्मूलन के इतिहास में साल्क टीका (IPV) और सेबिन टीका (OPV) दोनों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यद्यपि इनका उद्देश्य समान है अर्थात पोलियो रोग से सुरक्षा प्रदान करना फिर भी इनके निर्माण, उपयोग विधि, सुरक्षा स्तर और प्रयोग के क्षेत्र में कुछ मूलभूत अंतर पाए जाते हैं।
साल्क टीका जिसे इनऐक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (IPV) कहा जाता है मृत पोलियो वायरस से तैयार किया जाता है। चूँकि इसमें वायरस निष्क्रिय अवस्था में होता है इसलिए यह शरीर में रोग उत्पन्न नहीं करता। यह टीका इंजेक्शन के माध्यम से दिया जाता है और अत्यंत सुरक्षित माना जाता है। इसी कारण विकसित देशों में लंबे समय तक IPV का अधिक प्रयोग किया गया जहाँ स्वास्थ्य अवसंरचना सुदृढ़ और इंजेक्शन आधारित टीकाकरण सुगम था।
दूसरी ओर सेबिन टीका जिसे ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) कहा जाता है जीवित लेकिन कमजोर पोलियो वायरस से बनाया जाता है। इसे मुँह से पिलाया जाता है जिससे इसका वितरण सरल हो जाता है। हालाँकि इसमें अत्यंत दुर्लभ मामलों में जोखिम की संभावना बताई जाती है फिर भी इसकी सहजता और कम लागत के कारण विकासशील देशों में इसका व्यापक उपयोग हुआ। बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियानों जैसे पल्स पोलियो में OPV ने निर्णायक भूमिका निभाई।
सुरक्षा के दृष्टिकोण से IPV को अधिक सुरक्षित माना जाता है जबकि OPV सामुदायिक प्रतिरक्षा (हर्ड इम्युनिटी) विकसित करने में विशेष रूप से प्रभावी है। उपयोग की बात करें तो विकसित देशों ने जहाँ IPV को प्राथमिकता दी वहीं विकासशील देशों में OPV ने पोलियो उन्मूलन को व्यवहारिक और संभव बनाया।
इस प्रकार, साल्क और सेबिन दोनों टीके एक-दूसरे के पूरक सिद्ध हुए। इनकी संयुक्त रणनीति ने वैश्विक स्तर पर पोलियो के मामलों में अभूतपूर्व कमी लाई और कई देशों को पोलियो-मुक्त बनाने में सफलता दिलाई।
भारत में पोलियो उन्मूलन
भारत जैसे विशाल देश में पोलियो एक बड़ी चुनौती था।
- 1990 के दशक में लाखों बच्चे प्रभावित
- पल्स पोलियो अभियान की शुरुआत
- साल्क और सेबिन दोनों टीकों का उपयोग
2014 में भारत को आधिकारिक रूप से:
- “पोलियो-मुक्त देश” घोषित किया गया।
पोलियो उन्मूलन में साल्क टीके की भूमिका
- सुरक्षित आधार तैयार किया
- गंभीर पोलियो मामलों में भारी कमी
- टीकाकरण के प्रति जन-विश्वास बढ़ाया
आज भी कई देशों में IPV का उपयोग जारी है।
आधुनिक समय में पोलियो टीका
आज के समय में
- उन्नत IPV
- संयुक्त टीकाकरण कार्यक्रम
- वैश्विक निगरानी तंत्र
इन सबका मूल आधार वही है जो जोन्स साल्क ने रखा था।
वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व
जोन्स साल्क का योगदान केवल एक टीका नहीं था:
- यह वैज्ञानिक साहस का प्रतीक है
- यह मानवीय मूल्यों का उदाहरण है
- यह बताता है कि विज्ञान समाज के लिए है लाभ के लिए नहीं
आलोचनाएँ और चुनौतियाँ
हालाँकि साल्क को अपार सम्मान मिला फिर भी
- प्रारंभिक वर्षों में उनके दृष्टिकोण की आलोचना हुई
- कुछ तकनीकी समस्याएँ सामने आईं
परंतु समय ने सिद्ध कर दिया कि उनका मार्ग सही था।
जोन्स साल्क की विरासत
आज:
- Salk Institute उनके नाम से जाना जाता है
- उनका कार्य नई पीढ़ी के वैज्ञानिकों को प्रेरित करता है
- वे “मानवता के वैज्ञानिक” के रूप में स्मरण किए जाते हैं
पोलियो से मिली सीख
पोलियो और उसके टीके ने सिखाया कि
- रोग से लड़ाई संभव है
- विज्ञान और समाज का सहयोग आवश्यक है
- टीकाकरण मानव सभ्यता की रक्षा करता है
