लाहो नृत्य किसके द्वारा किया जाता है?

लाहो नृत्य मेघालय की जयन्तिया जनजाति द्वारा किया जाता है। भारत की सांस्कृतिक विविधता विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहाँ प्रत्येक राज्य, प्रत्येक जनजाति और प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट परंपराएँ, वेशभूषा, संगीत और नृत्य शैली हैं। उत्तर-पूर्व भारत विशेष रूप से अपनी जनजातीय संस्कृति और जीवंत लोक परंपराओं के लिए जाना जाता है। इसी क्षेत्र में स्थित मेघालय राज्य की जयन्तिया जनजाति द्वारा किया जाने वाला लाहो नृत्य एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय लोकनृत्य है। यह नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है बल्कि सामाजिक एकता, प्रेम, सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है।

लाहो नृत्य मेघालय की जयन्तिया जनजाति द्वारा किया जाता है।

मेघालय : संस्कृति और जनजातीय विरासत का राज्य

मेघालय का अर्थ है - बादलों का घर। यह राज्य अपनी हरियाली, पहाड़ियों, झरनों और वर्षा के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ मुख्यतः तीन जनजातियाँ निवास करती हैं:
  • खासी
  • गारो
  • जयन्तिया
इन तीनों जनजातियों की अपनी अलग-अलग भाषा, रीति-रिवाज और लोकनृत्य हैं। जयन्तिया जनजाति जो मुख्यतः जयन्तिया हिल्स क्षेत्र में निवास करती है, अपनी सांस्कृतिक समृद्धि और विशिष्ट नृत्य शैलियों के लिए जानी जाती है। लाहो नृत्य इसी परंपरा का एक सुंदर उदाहरण है।

जयन्तिया जनजाति का सामाजिक जीवन

जयन्तिया जनजाति का सामाजिक ढाँचा मातृसत्तात्मक है। यहाँ:
  • वंश परंपरा माँ की ओर से चलती है
  • संपत्ति का अधिकार पुत्रियों को मिलता है
  • पारिवारिक और सामाजिक निर्णयों में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है
इस सामाजिक संरचना का प्रभाव उनके लोकनृत्यों और उत्सवों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। लाहो नृत्य में पुरुष और महिला दोनों की समान भागीदारी इसी संतुलित सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाती है।

लाहो नृत्य का परिचय

लाहो नृत्य जयन्तिया जनजाति का एक प्रमुख सामूहिक लोकनृत्य है। इसे सामान्यतः उत्सवों, सामाजिक आयोजनों, सामुदायिक मेलों, विवाह या फसल से जुड़े अवसरों पर किया जाता है। यह नृत्य प्रसन्नता, प्रेम और सामूहिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है।

लाहो नृत्य का उद्देश्य और भाव

लाहो नृत्य केवल नृत्य नहीं बल्कि भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं:
  • समुदाय के सदस्यों के बीच एकता को मजबूत करना
  • युवा वर्ग में सामाजिक मेल-जोल को बढ़ावा देना
  • जीवन के सुखद क्षणों का सामूहिक उत्सव
  • पारंपरिक मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण
इस नृत्य में उल्लास, प्रेम, मित्रता और सामुदायिक भावना स्पष्ट रूप से झलकती है।

लाहो नृत्य की प्रस्तुति शैली

लाहो नृत्य की प्रस्तुति अत्यंत सरल, सहज और लयात्मक होती है।

समूह नृत्य

इस नृत्य में पुरुष और महिलाएँ एक साथ पंक्ति या अर्धवृत्त में नृत्य करते हैं। सभी नर्तक एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाए रखते हैं।

धीमी और लयबद्ध गतियाँ

लाहो नृत्य में बहुत तेज या उग्र गतियाँ नहीं होतीं। इसके कदम सौम्य, संतुलित और तालबद्ध होते हैं।

हाथों की पकड़

कई बार नर्तक हाथ पकड़कर या कंधे से कंधा मिलाकर नृत्य करते हैं जो सामाजिक एकता का प्रतीक है।

लाहो नृत्य में संगीत और वाद्य यंत्र

लाहो नृत्य का संगीत इसकी आत्मा है। पारंपरिक वाद्य यंत्र इस नृत्य को जीवंत बनाते हैं।

प्रमुख वाद्य यंत्र

  • ढोल जैसे पारंपरिक ताल वाद्य
  • बाँसुरी या स्थानीय पवन वाद्य
  • कभी-कभी सामूहिक गायन
संगीत की धुन सामान्यतः मधुर और दोहराव वाली होती है जिससे नर्तकों को ताल पकड़ने में सुविधा होती है।

लाहो नृत्य की वेशभूषा

वेशभूषा लाहो नृत्य की सुंदरता को और बढ़ा देती है। महिलाओं की वेशभूषा:
  • पारंपरिक रंगीन वस्त्र
  • हाथ से बुने कपड़े
  • आभूषण, जैसे मोती या चाँदी के गहने
पुरुषों की वेशभूषा:
  • साधारण पारंपरिक परिधान
  • कभी-कभी सिर पर कपड़े की पगड़ी
  • प्राकृतिक रंगों का प्रयोग
इन वस्त्रों में आधुनिक सजावट कम और पारंपरिक सादगी अधिक होती है।

लाहो नृत्य और प्रकृति का संबंध

जयन्तिया जनजाति का जीवन प्रकृति के बहुत निकट है। जंगल, पहाड़, नदियाँ और खेत उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। लाहो नृत्य में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, ऋतुओं का स्वागत, फसल की खुशी जैसी भावनाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। नृत्य की लय कई बार प्राकृतिक ध्वनियों से प्रेरित होती है।

सामाजिक एकता का प्रतीक लाहो नृत्य

लाहो नृत्य का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका सामूहिक स्वरूप है। इसमें:
  • उम्र, लिंग या सामाजिक स्थिति का भेद नहीं होता
  • सभी समुदायजन समान रूप से भाग लेते हैं
  • व्यक्तिगत प्रदर्शन से अधिक सामूहिक तालमेल पर ध्यान दिया जाता है
इस प्रकार यह नृत्य समाज में समानता और भाईचारे की भावना को मजबूत करता है।

त्योहारों में लाहो नृत्य

जयन्तिया जनजाति के प्रमुख त्योहारों और उत्सवों में लाहो नृत्य विशेष स्थान रखता है। इन अवसरों पर:
  • पूरे गाँव के लोग एकत्र होते हैं
  • पारंपरिक भोजन, संगीत और नृत्य का आयोजन होता है
  • युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया जाता है
  • आधुनिक मंचों पर प्रस्तुति
  • सांस्कृतिक महोत्सव
  • राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम
  • विद्यालय और महाविद्यालय के सांस्कृतिक आयोजन
इन मंचों पर लाहो नृत्य को नई पहचान मिल रही है।

लाहो नृत्य और सांस्कृतिक संरक्षण

आज के वैश्वीकरण के युग में लोकनृत्यों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। लाहो नृत्य:
  • जयन्तिया जनजाति की पहचान
  • मेघालय की सांस्कृतिक धरोहर
  • भारत की लोककला की विविधता का प्रतीक है।

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