संगम युग में मुरुगन न केवल एक देवता थे बल्कि वे तमिल अस्मिता, वीरता, प्रेम, युवा शक्ति और प्रकृति-पूजा के प्रतीक भी थे। इसीलिए यह कहना पूर्णतः उचित है कि संगम युग में तमिलों का सर्वाधिक लोकप्रिय देवता मुरुगन था।
संगम युग के बारे में
संगम युग (लगभग 300 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी तक) दक्षिण भारत के इतिहास का वह काल है जब तमिल भाषा, साहित्य और संस्कृति अपने चरम उत्कर्ष पर थी। इस युग में रचित साहित्य को संगम साहित्य कहा जाता है जिसमें:
- एत्तुत्तोगै
- पत्तुप्पाट्टु
- तोल्काप्पियम जैसे ग्रंथ शामिल हैं।
इन ग्रंथों में तत्कालीन समाज, युद्ध, प्रेम, प्रकृति और धर्म का जीवंत चित्रण मिलता है। धार्मिक दृष्टि से यह काल लोकधर्म और प्राकृतिक देवताओं की पूजा का काल था जिसमें मुरुगन का स्थान सबसे ऊपर था।
संगम युग की धार्मिक चेतना
संगम युग का धर्म वैदिक कर्मकांड से अलग, अधिक लोककेंद्रित और प्रकृतिपरक था। यहाँ देवता:
- सीधे जनजीवन से जुड़े थे
- प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक थे
- समाज की भावनाओं और आवश्यकताओं को अभिव्यक्त करते थे
इसी संदर्भ में मुरुगन का स्वरूप उभरकर सामने आता है जो तमिल समाज की आत्मा से गहराई से जुड़ा हुआ था।
मुरुगन : नाम, अर्थ और उत्पत्ति
मुरुगन शब्द का अर्थ है:
- युवा, सुंदर, तेजस्वी और कोमल
संगम साहित्य में मुरुगन को कई नामों से संबोधित किया गया है जैसे:
- सेयोन (लाल वर्ण वाला)
- वेल्लन (भाला धारण करने वाला)
- कुंदवेल मुरुगन
ये सभी नाम उनके सौंदर्य, वीरता और युद्धक कौशल को दर्शाते हैं।
मुरुगन : तमिलों के मूल देवता
संगम युग में मुरुगन को तमिलों का स्वदेशी देवता माना जाता था। वे:
- आर्य परंपरा से पहले भी पूजित थे
- पहाड़ी क्षेत्रों और जनजातीय समाज में विशेष रूप से लोकप्रिय थे
- स्थानीय विश्वासों से उत्पन्न देवता थे
इस कारण मुरुगन की पूजा तमिल समाज में अत्यंत स्वाभाविक और व्यापक थी।
तिणै व्यवस्था और मुरुगन
संगम साहित्य में जीवन को पाँच तिणै (प्राकृतिक क्षेत्र) में विभाजित किया गया है:
- कुरिंजी (पर्वतीय क्षेत्र)
- मुल्लै (वन क्षेत्र)
- मरुतम (कृषि क्षेत्र)
- नेयदल (तटीय क्षेत्र)
- पालय (शुष्क क्षेत्र)
इनमें कुरिंजी तिणै के प्रमुख देवता मुरुगन थे। चूँकि कुरिंजी क्षेत्र में रहने वाले लोग शिकारी, योद्धा, पशुपालक थे। इसलिए मुरुगन को उनका संरक्षक और आदर्श देवता माना गया।
संगम साहित्य में मुरुगन का वर्णन
संगम साहित्य में मुरुगन का उल्लेख अत्यंत श्रद्धा और प्रेम के साथ किया गया है। कवियों ने उन्हें:
- वीर योद्धा
- युवा नायक
- प्रेम और सौंदर्य के प्रतीक के रूप में चित्रित किया है।
कुरिंजी गीतों में मुरुगन की स्तुति, उनके पर्व, उनके नृत्य और उनकी पूजा का विस्तृत वर्णन मिलता है।
मुरुगन और वीरता का संबंध
संगम युग एक युद्धप्रिय समाज का काल था। युद्ध, वीरता और शौर्य को अत्यधिक महत्व दिया जाता था। मुरुगन:
- युद्ध के देवता थे
- भाले (वेल) को धारण करते थे
- शत्रुओं का नाश करने वाले माने जाते थे
इसलिए योद्धा वर्ग में मुरुगन की पूजा विशेष रूप से प्रचलित थी।
मुरुगन और युवा शक्ति
मुरुगन को युवावस्था का देवत माना जाता था। वे:
- ऊर्जा
- उत्साह
- साहस
- प्रेम के प्रतीक थे।
संगम युग का युवा वर्ग मुरुगन में अपनी आकांक्षाओं और आदर्शों का प्रतिबिंब देखता था।
मुरुगन और प्रेम परंपरा
संगम साहित्य का एक बड़ा भाग अगम साहित्य है जो प्रेम और मानवीय भावनाओं पर आधारित है। इसमें मुरुगन:
- प्रेम के साक्षी
- प्रेमियों के संरक्षक
- विवाह और मिलन के देवता के रूप में भी पूजित थे।
मुरुगन पूजा की विधियाँ
संगम युग में मुरुगन की पूजा:
- सरल
- लोकपरंपरागत
- सामूहिक रूप में की जाती थी।
इसमें:
- नृत्य
- संगीत
- बलि उत्सव शामिल थे। यह पूजा जनजीवन का अभिन्न अंग थी।
वेल (भाला) का धार्मिक महत्व
मुरुगन का प्रमुख प्रतीक वेल (भाला) था। यह:
- शक्ति
- न्याय
- रक्षा का प्रतीक माना जाता था।
संगम युग में वेल की पूजा स्वयं एक धार्मिक क्रिया थी।
मुरुगन और प्रकृति पूजा
संगम युग की धार्मिक चेतना प्रकृति से गहराई से जुड़ी थी। मुरुगन:
- पर्वतों में वास करने वाले
- वन और झरनों से जुड़े
- प्राकृतिक शक्तियों के प्रतिनिधि देवता थे।
स्त्रियाँ और मुरुगन पूजा
संगम युग की स्त्रियाँ भी मुरुगन की उपासना में सक्रिय भूमिका निभाती थीं। वे:
- संतान प्राप्ति
- पति की सुरक्षा
- पारिवारिक सुख के लिए मुरुगन की पूजा करती थीं।
मुरुगन उत्सव और लोकजीवन
मुरुगन से जुड़े उत्सव:
- सामाजिक एकता
- सांस्कृतिक अभिव्यक्ति
- धार्मिक आनंद का माध्यम थे।
इन उत्सवों में संपूर्ण समुदाय भाग लेता था।
मुरुगन बनाम अन्य देवता
संगम युग में अन्य देवताओं की भी पूजा होती थी जैसे:
- इंद्र
- वरुण
- कोर्रवै
किन्तु मुरुगन:
- सबसे अधिक उल्लेखित
- सबसे व्यापक रूप से पूजित
- सबसे भावनात्मक रूप से जुड़े देवता थे।
यही कारण है कि उन्हें तमिलों का सर्वाधिक लोकप्रिय देवता माना जाता है।
आर्य प्रभाव और मुरुगन
बाद के काल में जब आर्य प्रभाव बढ़ा तब भी मुरुगन की लोकप्रियता बनी रही। उन्हें:
- स्कंद
- कार्तिकेय से जोड़ा गया परंतु उनका मूल तमिल स्वरूप समाप्त नहीं हुआ।
मुरुगन : तमिल अस्मिता का प्रतीक
मुरुगन केवल धार्मिक देवता नहीं बल्कि:
- तमिल संस्कृति
- तमिल भाषा
- तमिल गौरव के प्रतीक बन गए।
संगम युग के बाद भी मुरुगन की निरंतरता
संगम युग के बाद भी मुरुगन की पूजा:
- भक्ति आंदोलन
- मंदिर संस्कृति
- लोकपरंपराओं में निरंतर बनी रही जो उनकी गहरी जड़ों को दर्शाती है।
