शास्त्रीय नृत्य की तकनीक को 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में संहिताबद्ध किसके द्वारा किया गया था?

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शास्त्रीय नृत्य की तकनीक को 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में संहिताबद्ध भरत मुनि द्वारा किया गया था। भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध कलात्मक परंपराओं में से एक है। इसकी तकनीकी, सौंदर्यात्मक और दार्शनिक आधारशिला 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में आचार्य भरत मुनि द्वारा रखी गई थी। भरत मुनि ने भारतीय नाट्य, नृत्य और संगीत की विधाओं को एक सुव्यवस्थित शास्त्रीय स्वरूप प्रदान किया जिससे आगे चलकर शास्त्रीय नृत्यों की सुदृढ़ परंपरा विकसित हुई।

शास्त्रीय नृत्य की तकनीक को 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में संहिताबद्ध भरत मुनि द्वारा किया गया था।

नाट्यशास्त्र : शास्त्रीय नृत्य का मूल ग्रंथ

भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की तकनीक का आधार ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथ में नृत्य, नाटक और संगीत के सिद्धांतों को वैज्ञानिक एवं दार्शनिक दृष्टि से संहिताबद्ध किया गया है। नाट्यशास्त्र में अंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्त्विक अभिनय का विस्तार से वर्णन मिलता है जो आज भी सभी शास्त्रीय नृत्य शैलियों की बुनियाद है।

तकनीकी संरचना का विकास

भरत मुनि ने नृत्य की तकनीक को स्पष्ट नियमों और सूत्रों में बाँधा। उन्होंने शरीर की विभिन्न गतियों, हस्त मुद्राओं, चरण संचालन, नेत्राभिनय और भाव-भंगिमाओं को व्यवस्थित किया। रस सिद्धांत का प्रतिपादन भी भरत मुनि की ही देन है जिसके अनुसार नृत्य का उद्देश्य दर्शक में भावनात्मक अनुभूति उत्पन्न करना है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्यों पर प्रभाव

भरत मुनि द्वारा 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में किए गए इस संहिताकरण का प्रभाव भरतनाट्यम, कथक, कथकली, ओडिसी, कुचिपुड़ी, मणिपुरी, मोहिनीअट्टम और सत्रिया जैसे सभी भारतीय शास्त्रीय नृत्य रूपों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यद्यपि इन नृत्यों की क्षेत्रीय शैली अलग-अलग है फिर भी उनकी तकनीकी आत्मा नाट्यशास्त्र से ही उपजी है।

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