हर दिन सीखें कुछ नया — हर दिन मनाएं ज्ञान का “Happy New Year”! 🎉 जैसे नया साल नई उम्मीदों और नई शुरुआत का प्रतीक होता है वैसे ही हमारा मानना है कि हर दिन सीखने के लिए एक नया अवसर होता है।
कथक और कथा की परंपरा
प्राचीन भारत में मंदिरों, राजदरबारों और सार्वजनिक स्थलों पर कथावाचक धार्मिक, पौराणिक और लोक कथाओं का गायन एवं अभिनय किया करते थे। ये कथावाचक हाथों की मुद्राओं, चेहरे के भावों और शरीर की गतियों के माध्यम से कथाओं को जीवंत बनाते थे। समय के साथ यही कथावाचन परंपरा एक सुव्यवस्थित नृत्य शैली में विकसित हुई जिसे आगे चलकर कथक कहा गया।
नृत्य के माध्यम से कहानी कहने की कला
कथक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कथात्मक शैली है। इसमें नर्तक अपने अभिनय (अभिनय), नेत्र भाव, हस्त मुद्राओं और पद संचालन के द्वारा पूरी कहानी प्रस्तुत करता है। रामायण, महाभारत, कृष्ण-लीला तथा अन्य पौराणिक कथाएँ कथक की प्रमुख विषयवस्तु रही हैं। इसीलिए कथक को “कहानी कहने वाला नृत्य” भी कहा जाता है।
संगीत और ताल का महत्व
कथक में केवल कथा ही नहीं बल्कि संगीत और ताल का भी विशेष महत्व है। तबला, पखावज और घुंघरुओं की लय कथा के भावों को और अधिक प्रभावशाली बनाती है। नर्तक जब तीव्र चक्कर, भावपूर्ण अभिनय और लयबद्ध चरणों के माध्यम से कथा प्रस्तुत करता है तो दर्शक स्वयं को उस कहानी का हिस्सा महसूस करने लगता है।
