चाली, झुमुरा और नाडु भंगी किस नृत्य के रूप है?

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चाली, झुमुरा और नाडु भंगी सत्त्रिया शास्त्रीय नृत्य के रूप है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा में सत्त्रिया नृत्य का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह नृत्य रूप असम की वैष्णव भक्ति परंपरा से विकसित हुआ है और इसकी स्थापना महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव से जुड़ी मानी जाती है। सत्त्रिया नृत्य की शास्त्रीय संरचना में चाली, झुमुरा और नाडु भंगी तीन महत्वपूर्ण और विशिष्ट रूप माने जाते हैं।

चाली, झुमुरा और नाडु भंगी सत्त्रिया शास्त्रीय नृत्य के रूप है।

चाली

चाली, सत्त्रिया नृत्य की मूल और आधारभूत गति संरचना है। इसमें नृत्य की कोमल, संतुलित और प्रवाहपूर्ण चालों का समावेश होता है। चाली के माध्यम से नर्तक शरीर की सही स्थिति, संतुलन और लय को साधता है। यह सत्त्रिया नृत्य की तकनीकी नींव मानी जाती है जिस पर आगे की जटिल प्रस्तुतियाँ आधारित होती हैं।

झुमुरा

झुमुरा, सत्त्रिया नृत्य का अधिक गतिशील और ऊर्जावान रूप है। इसमें तेज़ ताल, लयात्मक पद संचालन और सशक्त गतियों का प्रयोग किया जाता है। झुमुरा में वीरता, उत्साह और नाटकीय प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह रूप दर्शकों में ऊर्जा और भावनात्मक तीव्रता उत्पन्न करता है।

नाडु भंगी

नाडु भंगी, सत्त्रिया नृत्य की एक विशिष्ट देहभंगिमा शैली है। इसमें शरीर को विशेष कोणों और मुद्राओं में मोड़कर सौंदर्य और भाव की अभिव्यक्ति की जाती है। नाडु भंगी नृत्य को शास्त्रीय गरिमा प्रदान करती है और भावाभिनय को अधिक प्रभावशाली बनाती है।

शास्त्रीय और आध्यात्मिक महत्व

चाली, झुमुरा और नाडु भंगी तीनों रूप सत्त्रिया नृत्य की शास्त्रीय पहचान को सुदृढ़ करते हैं। ये केवल तकनीकी तत्व नहीं हैं बल्कि भक्ति, नाट्य और सौंदर्य का समन्वय भी प्रस्तुत करते हैं। सत्त्रिया नृत्य में इन रूपों के माध्यम से आध्यात्मिक भावनाएँ और वैष्णव दर्शन सजीव हो उठता है।

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