यूनेस्को ने केरल के अनुष्ठान नाटक 'मुडियेट्टू' को 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' के रूप में मान्यता कब दी?

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भारत की सांस्कृतिक विविधता और परंपराएँ सदियों से विश्व को आकर्षित करती रही हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक है ‘मुडियेट्टू’ जो केरल राज्य की एक पारंपरिक अनुष्ठानिक नाट्य कला है। वर्ष 2010 में यूनेस्को (UNESCO) ने इसे ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ के रूप में शामिल किया जो भारतीय लोकसंस्कृति के लिए गर्व और सम्मान का विषय है।

मुडियेट्टू एक लोकनाट्य

मुडियेट्टू का परिचय

मुडियेट्टू एक लोकनाट्य रूप है जिसका प्रदर्शन केरल के मध्य भागों विशेषकर एर्नाकुलम, इडुक्की, और कोट्टायम जिलों के मंदिरों में किया जाता है। यह नाटक देवी और दानव दारिका के बीच हुए युद्ध की पौराणिक कथा को प्रस्तुत करता है। प्रस्तुति देवी काली की आराधना के रूप में होती है जिसमें भक्ति, नृत्य, संगीत और मुखावरण कला (mask making) का अद्भुत संगम दिखाई देता है। 

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

मुडियेट्टू केवल एक नाट्य प्रदर्शन नहीं है बल्कि यह एक सामुदायिक अनुष्ठान भी है। इसमें गाँव के लोग मिलकर देवी की पूजा करते हैं और नाट्य के माध्यम से पाप, अन्याय और अहंकार के विनाश का संदेश दिया जाता है। प्रत्येक वर्ष यह नाटक देवी के मंदिर में फसल कटाई के बाद मनाया जाता है जिससे यह कृषि संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है।  

यूनेस्को की मान्यता का महत्व

यूनेस्को की यह मान्यता इस लोककला की अंतरराष्ट्रीय पहचान को मजबूत करती है। इससे न केवल इस परंपरा को संरक्षण और प्रोत्साहन मिलने लगा बल्कि युवा पीढ़ी में भी अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ने की प्रेरणा बढ़ी। यह मान्यता भारत के लिए गौरव का विषय है क्योंकि यह विश्व को यह संदेश देती है कि भारत की सांस्कृतिक धरोहरें केवल भौतिक स्मारकों तक सीमित नहीं बल्कि जीवंत परंपराओं में भी विद्यमान हैं। 

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