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सत्त्रिया की मान्यता: वर्ष 2000
सत्त्रिया नृत्य मूलतः असम के वैष्णव मठों जिन्हें ‘सत्त्र’ कहा जाता है, में धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। 15 नवंबर 2000 को संगीत नाटक अकादमी ने सत्त्रिया को आधिकारिक रूप से भारत के शास्त्रीय नृत्यों की सूची में शामिल किया जिससे देश के शास्त्रीय नृत्य रूपों की संख्या बढ़कर आठ हो गई।
उत्पत्ति और धार्मिक आधार
सत्त्रिया नृत्य की रचना 15वीं–16वीं शताब्दी में महान संत, समाज-सुधारक और वैष्णव आचार्य महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव ने की थी जिन्होंने इसे ‘अंकिया नाट’ और ‘भाओना’ के माध्यम से भक्तिमय नाट्य-नृत्य रूप में विकसित किया। असम के कृष्ण-केंद्रित वैष्णव मठों में यह नृत्य-नाट्य रूप भगवद्गीता, भागवत पुराण और वेदांत पर आधारित भक्तिकाव्य, कीर्तन और नाटकों को मंचित करने का माध्यम बना।
नृत्य-नाट्य की विशेषताएँ
सत्त्रिया नृत्य केवल शुद्ध नृत्य (नृत्य) ही नहीं बल्कि संवाद, अभिनय, संगीत और कथानक पर आधारित पूर्ण नृत्य-नाटक शैली है। इसके विषय मुख्यतः भगवान कृष्ण के जीवन, उनकी लीला, असुर-वध, भक्तों के प्रति कृपा और नैतिक संदेशों पर केंद्रित होते हैं जिन्हें प्रतीकात्मक भाव, हस्तमुद्राओं और समूह नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
वेशभूषा, संगीत और परंपरा
परंपरागत रूप से सत्त्रिया केवल पुरुष भिक्षुओं (भकतन या भोनिया) द्वारा प्रस्तुत किया जाता था किंतु आधुनिक काल में महिला नर्तकियों ने भी इसे अपनाकर इसे व्यापक सामाजिक मंच पर पहुँचा दिया। नृत्य में सफेद या पीले रेशमी परिधान, धोती, चादर, पगड़ी, साथ ही पारंपरिक असमिया ‘पट’ और ‘माखेला-चादर’ जैसी वेशभूषा, ढोल, करताल, बांसुरी और संकीर्तन संगीत के साथ भक्ति वातावरण रचते हैं।
राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान
संगीत नाटक अकादमी की 2000 की मान्यता के बाद सत्त्रिया नृत्य असम के मठों और सत्त्रों की सीमाओं से निकल कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सशक्त रूप से उभरा। आज सत्त्रिया नृत्य को भारत के सबसे युवा शास्त्रीय नृत्य रूपों में गिना जाता है जो पारंपरिक वैष्णव भक्ति, नाट्यशास्त्रीय सिद्धांतों और आधुनिक प्रस्तुति-शैली सभी को एक साथ जोड़े हुए है।
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