उनकी साधना, कला-निष्ठा और आजीवन योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार की शीर्ष सांस्कृतिक संस्था संगीत नाटक अकादमी द्वारा उन्हें सत्त्रिया नृत्य के लिए प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धि है बल्कि सत्त्रिया नृत्य परंपरा के लिए भी गौरव का विषय है।
सत्त्रिया नृत्य: परिचय
सत्त्रिया नृत्य भारत की आठ मान्यता प्राप्त शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है। इसका उद्भव असम में 15वीं–16वीं शताब्दी में महान वैष्णव संत और समाज सुधारक **शंकरदेव** द्वारा स्थापित सत्त्र (वैष्णव मठ) परंपरा से हुआ। प्रारंभ में यह नृत्य केवल मठों तक सीमित था और भक्ति, नाटक तथा संगीत के माध्यम से धार्मिक उपदेश देने का माध्यम था।
सत्त्रिया नृत्य की विशेषताएँ
- वैष्णव भक्ति पर आधारित विषयवस्तु
- अभिनय (अभिनय), नृत्य (नृत्त) और नाट्य (नाट्य) का समन्वय
- पारंपरिक ताल, राग और वाद्ययंत्रों का प्रयोग
- शुद्ध शास्त्रीय अनुशासन और आध्यात्मिक भाव
समय के साथ सत्त्रिया नृत्य ने मठों की सीमाओं को पार किया और आधुनिक मंचों तक पहुँचा। इस परिवर्तन में जिन कलाकारों की भूमिका निर्णायक रही उनमें गुणकांत दत्ता बोरब्यान अग्रणी रहे।
गुणकांत दत्ता बोरब्यान: जीवन और पृष्ठभूमि
गुणकांत दत्ता बोरब्यान का जन्म असम की सांस्कृतिक भूमि पर हुआ जहाँ सत्त्रिया नृत्य केवल एक कला नहीं बल्कि जीवन-दर्शन का हिस्सा है। उन्होंने बाल्यकाल से ही सत्त्रिया परंपरा में दीक्षित होकर गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत कठोर प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनका व्यक्तित्व तीन प्रमुख आयामों में विकसित हुआ:
- नर्तक (Performer)
- गुरु (Teacher)
- संरक्षक व प्रचारक (Preserver & Promoter)
उन्होंने न केवल मंच पर सत्त्रिया नृत्य की उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ दीं बल्कि इसकी शुद्धता, अनुशासन और मूल दर्शन को बनाए रखने का भी सतत प्रयास किया।
सत्त्रिया नृत्य में गुणकांत दत्ता बोरब्यान का योगदान
शास्त्रीय अनुशासन का संरक्षण
- गुणकांत दत्ता बोरब्यान ने सत्त्रिया नृत्य के पारंपरिक शास्त्रीय ढांचे को अक्षुण्ण रखा। उन्होंने नृत्य को आधुनिक बनाने के नाम पर उसकी मूल आत्मा से समझौता नहीं किया।
गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन
- उन्होंने अनेक शिष्यों को सत्त्रिया नृत्य की विधिवत शिक्षा दी। उनके शिष्य आज भारत और विदेशों में सत्त्रिया नृत्य का प्रचार कर रहे हैं।
मंचीय विस्तार
- उन्होंने सत्त्रिया नृत्य को मठों की सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया जिससे इसे वैश्विक पहचान मिली।
शोध और दस्तावेज़ीकरण
- उन्होंने सत्त्रिया नृत्य की परंपराओं, मुद्राओं, तालों और कथाओं के संरक्षण हेतु शोधात्मक कार्य भी किया जो भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है।
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार: परिचय
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भारत में संगीत, नृत्य और नाट्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान है। यह पुरस्कार उन कलाकारों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने भारतीय प्रदर्शन कलाओं में दीर्घकालीन और उल्लेखनीय योगदान दिया हो। इस पुरस्कार की विशेषताएँ:
- राष्ट्रीय स्तर की मान्यता
- आजीवन साधना का सम्मान
- भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में योगदान का मूल्यांकन
गुणकांत दत्ता बोरब्यान को यह पुरस्कार मिलना इस बात का प्रमाण है कि उनका योगदान केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि राष्ट्रीय महत्व का है।
पुरस्कार से सम्मानित किया जाना: महत्व
गुणकांत दत्ता बोरब्यान को सत्त्रिया नृत्य के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जाना कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है:
- व्यक्तिगत सम्मान – एक कलाकार की आजीवन साधना को राष्ट्रीय स्वीकृति
- सत्त्रिया नृत्य का गौरव – असम की सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय मंच
- नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा – युवा कलाकारों को शास्त्रीय कला अपनाने की प्रेरणा
- सांस्कृतिक संरक्षण – परंपरा और आधुनिकता के संतुलन का उदाहरण
सत्त्रिया नृत्य और असम की सांस्कृतिक पहचान
सत्त्रिया नृत्य असम की सांस्कृतिक आत्मा है। यह नृत्य केवल कला नहीं बल्कि सामाजिक समरसता, भक्ति और नैतिक मूल्यों का संवाहक है। गुणकांत दत्ता बोरब्यान जैसे कलाकारों ने इस नृत्य को जीवंत बनाए रखा और इसे बदलते समय के साथ प्रासंगिक बनाया।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
गुणकांत दत्ता बोरब्यान की प्रस्तुतियाँ भारत के विभिन्न सांस्कृतिक मंचों के साथ-साथ विदेशों में भी सराही गईं। उनके माध्यम से:
- सत्त्रिया नृत्य को वैश्विक पहचान मिली
- भारतीय शास्त्रीय नृत्य की विविधता विश्व के सामने आई
- सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) को बल मिला
समकालीन परिप्रेक्ष्य में उनका योगदान
आज के समय में जब पारंपरिक कलाएँ व्यावसायिक दबावों से जूझ रही हैं गुणकांत दत्ता बोरब्यान का योगदान यह सिखाता है कि:
- शास्त्रीयता और लोकप्रियता में संतुलन संभव है
- परंपरा को आधुनिक मंचों पर गरिमा के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है
- कला केवल प्रदर्शन नहीं, साधना है
