आज के आधुनिक युग में जब वैश्विक स्तर पर वायरल रोगों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है तब वाइरोलॉजी का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। चिकित्सा विज्ञान, पशु चिकित्सा, कृषि, जैव-प्रौद्योगिकी तथा पर्यावरण विज्ञान सभी क्षेत्रों में वाइरोलॉजी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वाइरोलॉजी का ऐतिहासिक विकास
वाइरोलॉजी का विकास अपेक्षाकृत नया है किंतु इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक है। 19वीं शताब्दी के अंत में वैज्ञानिकों ने यह समझना प्रारंभ किया कि कुछ रोग ऐसे हैं जिनका कारण न तो बैक्टीरिया हैं और न ही कोई अन्य ज्ञात सूक्ष्मजीव।
सबसे पहले 1892 में रूसी वैज्ञानिक दिमित्री इवानोव्स्की ने तंबाकू के पौधों में होने वाले मोज़ेक रोग का अध्ययन करते हुए यह पाया कि रोगकारक तत्व बैक्टीरिया से भी छोटा है। बाद में 1898 में डच वैज्ञानिक मार्टिनस बेजरिन्क ने इस तत्व को “कॉन्टेजियम विवम फ्लूइडम” नाम दिया और इसे विषाणु (Virus) कहा।
इसके पश्चात 20वीं शताब्दी में इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के विकास से विषाणुओं की संरचना को प्रत्यक्ष रूप से देखना संभव हुआ और वाइरोलॉजी एक स्वतंत्र विज्ञान शाखा के रूप में स्थापित हुई।
विषाणु (Virus) की परिभाषा
विषाणु अति-सूक्ष्म संक्रामक कण होते हैं जो केवल जीवित कोशिकाओं के भीतर ही वृद्धि और गुणन (Replication) कर सकते हैं। इनमें स्वयं का चयापचय तंत्र नहीं होता और ये मेज़बान कोशिका की जैविक मशीनरी का उपयोग करके अपने नए कण बनाते हैं। सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि:
- विषाणु ऐसे परजीवी कण हैं जो केवल जीवित कोशिकाओं में ही सक्रिय होते हैं।
विषाणुओं की संरचना
विषाणुओं की संरचना अपेक्षाकृत सरल होती है किंतु यह उनकी संक्रमण क्षमता को अत्यंत प्रभावी बनाती है।
न्यूक्लिक अम्ल
- विषाणु में केवल एक ही प्रकार का न्यूक्लिक अम्ल पाया जाता है:
- DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) या
- RNA (राइबोन्यूक्लिक अम्ल)
यह न्यूक्लिक अम्ल विषाणु की आनुवंशिक सूचना को वहन करता है।
कैप्सिड (Capsid)
- न्यूक्लिक अम्ल के चारों ओर एक प्रोटीन आवरण होता है जिसे कैप्सिड कहा जाता है। यह विषाणु को सुरक्षा प्रदान करता है।
एनवेलप (Envelope)
- कुछ विषाणुओं में कैप्सिड के बाहर एक अतिरिक्त लिपिड आवरण भी पाया जाता है जिसे एनवेलप कहते हैं। यह आवरण मेज़बान कोशिका की झिल्ली से प्राप्त होता है।
विषाणुओं के प्रमुख गुण
विषाणुओं में कई विशिष्ट गुण पाए जाते हैं जो उन्हें अन्य सूक्ष्मजीवों से अलग बनाते हैं:
- ये अति-सूक्ष्म होते हैं और सामान्य प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से दिखाई नहीं देते।
- ये केवल जीवित कोशिकाओं में ही सक्रिय होते हैं।
- इनमें स्वतंत्र ऊर्जा उत्पादन या प्रोटीन संश्लेषण की क्षमता नहीं होती।
- ये विशिष्ट मेज़बान और ऊतक के प्रति अत्यधिक विशिष्ट होते हैं।
- ये तीव्र गति से उत्परिवर्तन (Mutation) कर सकते हैं।
विषाणुओं का वर्गीकरण
वाइरोलॉजी में विषाणुओं का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है:
न्यूक्लिक अम्ल के आधार पर
- DNA वायरस
- RNA वायरस
संरचना के आधार पर
- एनवेलपयुक्त वायरस
- बिना एनवेलप वाले वायरस
मेज़बान के आधार पर
- पादप विषाणु
- पशु विषाणु
- मानव विषाणु
- जीवाणुभोजी (Bacteriophages)
विषाणुओं की जीवन-चक्र (Life Cycle)
विषाणुओं का जीवन-चक्र मेज़बान कोशिका पर निर्भर करता है और इसके प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं:
- आसंजन (Attachment) – विषाणु मेज़बान कोशिका की सतह से जुड़ता है।
- प्रवेश (Penetration) – विषाणु कोशिका के भीतर प्रवेश करता है।
- अनकोटिंग (Uncoating) – विषाणु का आवरण हटता है।
- संश्लेषण (Synthesis) – मेज़बान कोशिका की सहायता से विषाणु के घटकों का निर्माण होता है।
- संयोजन (Assembly) – नए विषाणु कण बनते हैं।
- मुक्ति (Release) – नए विषाणु कोशिका से बाहर निकलते हैं।
विषाणुजनित रोग
वाइरोलॉजी का एक प्रमुख उद्देश्य विषाणुजनित रोगों का अध्ययन करना है। मानव, पशु और पौधों तीनों में विषाणु गंभीर रोग उत्पन्न करते हैं।
मानव में
- इन्फ्लुएंजा
- खसरा
- पोलियो
- हेपेटाइटिस
- एड्स
पशुओं में
- खुरपका-मुंहपका रोग
- रैबीज
पौधों में
- तंबाकू मोज़ेक रोग
- पत्तियों का पीला पड़ना
प्रतिरक्षा और विषाणु
मानव शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र विषाणुओं से लड़ने के लिए एंटीबॉडी और कोशिकीय प्रतिरक्षा का उपयोग करता है। वाइरोलॉजी में यह अध्ययन किया जाता है कि विषाणु किस प्रकार प्रतिरक्षा तंत्र से बच निकलते हैं और शरीर उन्हें कैसे निष्क्रिय करता है।
टीके (Vaccines) और वाइरोलॉजी
टीकों का विकास वाइरोलॉजी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। टीके शरीर को विषाणुओं के विरुद्ध पहले से तैयार कर देते हैं जिससे रोग की गंभीरता कम हो जाती है या रोग उत्पन्न ही नहीं होता।
आधुनिक वाइरोलॉजी और जैव-प्रौद्योगिकी
आधुनिक वाइरोलॉजी में जीन थेरेपी, रिकॉम्बिनेंट DNA तकनीक, वायरल वेक्टर और नैनो-बायोटेक्नोलॉजी जैसे उन्नत विषय शामिल हैं। विषाणुओं का उपयोग अब केवल रोगजनक के रूप में नहीं बल्कि चिकित्सा और अनुसंधान के उपयोगी उपकरण के रूप में भी किया जा रहा है।
वाइरोलॉजी का महत्व
वाइरोलॉजी का महत्व निम्न क्षेत्रों में विशेष रूप से है:
- चिकित्सा विज्ञान
- सार्वजनिक स्वास्थ्य
- कृषि उत्पादन
- जैव-प्रौद्योगिकी
- पर्यावरण संरक्षण
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