मुहम्मद बिन तुगलक का सबसे प्रसिद्ध और विवादित आर्थिक प्रयोग कांस्य में सांकेतिक (Token) सिक्कों का प्रचलन था। यह प्रयोग अपने समय से बहुत आगे की सोच का प्रतीक था। किंतु प्रशासनिक अक्षमता और सामाजिक परिस्थितियों के कारण यह प्रयोग असफल सिद्ध हुआ।
तुगलक काल की आर्थिक पृष्ठभूमि
13वीं–14वीं शताब्दी का भारत एक विशाल भूभाग वाला साम्राज्य था। दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत उत्तर भारत के अतिरिक्त दक्कन और दक्षिण भारत के कई क्षेत्र भी आ चुके थे। इतने बड़े साम्राज्य के संचालन के लिए विशाल सेना, प्रशासनिक तंत्र और संचार व्यवस्था की आवश्यकता थी।
मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में निरंतर सैनिक अभियानों, विद्रोहों के दमन और प्रशासनिक सुधारों के कारण राजकोष पर भारी दबाव पड़ा। स्वर्ण और रजत जैसी बहुमूल्य धातुओं की उपलब्धता सीमित थी। जबकि सिक्कों की मांग बढ़ती जा रही थी। ऐसे समय में उन्होंने एक नवीन मौद्रिक प्रयोग की योजना बनाई।
सांकेतिक मुद्रा (Token Currency) की अवधारणा
सांकेतिक मुद्रा वह मुद्रा होती है जिसका अंकित मूल्य (Face Value) उसकी वास्तविक धातु कीमत से अधिक होता है। आधुनिक समय में काग़ज़ी नोट और सिक्के इसी सिद्धांत पर आधारित हैं।
मुहम्मद बिन तुगलक ने इस अवधारणा को 14वीं शताब्दी में ही अपनाने का प्रयास किया जो अपने समय से कई शताब्दियाँ आगे की सोच थी। उन्होंने कांस्य और पीतल जैसी सस्ती धातुओं में ऐसे सिक्के चलाए जिनका मूल्य स्वर्ण और रजत सिक्कों के बराबर घोषित किया गया।
कांस्य में सांकेतिक सिक्कों के प्रचलन का उद्देश्य
राजकोष की समस्या का समाधान
- स्वर्ण और रजत की कमी के कारण सरकार को मुद्रा निर्माण में कठिनाई हो रही थी। कांस्य सस्ती धातु थी जिससे बड़ी मात्रा में सिक्के बनाए जा सकते थे।
सैन्य अभियानों का वित्तपोषण
- मुहम्मद बिन तुगलक की साम्राज्य विस्तार नीति अत्यंत महत्वाकांक्षी थी। इसके लिए बड़ी सेना और धन की आवश्यकता थी।
व्यापार को बढ़ावा
- अधिक मुद्रा प्रचलन में लाकर व्यापार और लेन-देन को सरल बनाना भी इस योजना का उद्देश्य था।
नवीन प्रयोगों में रुचि
- मुहम्मद बिन तुगलक बौद्धिक दृष्टि से अत्यंत प्रखर थे। वे गणित, दर्शन, खगोलशास्त्र और अर्थशास्त्र में रुचि रखते थे और नए प्रयोग करना चाहते थे।
कांस्य सिक्कों का स्वरूप और प्रचलन
इन सिक्कों पर सुल्तान का नाम और धार्मिक वाक्य अंकित होते थे। बाहरी रूप से ये वास्तविक मुद्रा जैसे ही थे जिससे आम जनता और व्यापारी भ्रमित हो जाते थे।
सरकार ने आदेश दिया कि इन कांस्य सिक्कों को भी स्वर्ण और रजत सिक्कों के समान ही स्वीकार किया जाए। कर भुगतान, वेतन, व्यापार हर जगह इन्हें वैध मुद्रा घोषित किया गया।
प्रशासनिक कमज़ोरियाँ
- योजना जितनी नवीन थी उसका क्रियान्वयन उतना ही दोषपूर्ण था।
टकसालों पर नियंत्रण की कमी
- सरकार निजी टकसालों पर नियंत्रण स्थापित करने में असफल रही।
जालसाज़ी की बाढ़
- कांस्य जैसी सस्ती धातु होने के कारण लोग अपने घरों में ही नकली सिक्के ढालने लगे।
विश्वास का अभाव
- जनता और व्यापारी इस मुद्रा पर विश्वास नहीं कर पाए क्योंकि इसका वास्तविक मूल्य बहुत कम था।
आर्थिक अराजकता और परिणाम
मुद्रा का अवमूल्यन
- नकली सिक्कों की अधिकता से मुद्रा का मूल्य तेजी से गिर गया।
व्यापार में गिरावट
- व्यापारियों ने लेन-देन बंद कर दिया या केवल स्वर्ण-रजत में व्यापार करना शुरू कर दिया।
राजकोष को भारी नुकसान
- सरकार को अंततः यह योजना वापस लेनी पड़ी और कांस्य सिक्कों को स्वर्ण-रजत से बदलना पड़ा जिससे खजाने पर भारी बोझ पड़ा।
योजना की वापसी और उसके दुष्परिणाम
- मुहम्मद बिन तुगलक ने जब इस योजना को समाप्त किया तब उन्होंने आदेश दिया कि सभी कांस्य सिक्कों को सरकारी खजाने में लाकर बदला जाए।
इतिहासकारों के अनुसार, खजाना नकली और असली सिक्कों से भर गया और राज्य को भारी आर्थिक क्षति हुई। इस असफलता ने सुल्तान की प्रतिष्ठा को भी गहरा आघात पहुँचाया।
इतिहासकारों की दृष्टि
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
- बरनी और बदायूँनी जैसे इतिहासकारों ने इस योजना को सुल्तान की अव्यावहारिकता का उदाहरण बताया।
आधुनिक दृष्टिकोण
- आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि विचार गलत नहीं था बल्कि समय, सामाजिक संरचना और प्रशासनिक क्षमता इसके लिए तैयार नहीं थी।
आधुनिक मुद्रा प्रणाली से तुलना
आज की काग़ज़ी मुद्रा भी सांकेतिक मुद्रा ही है जिसका मूल्य सरकारी विश्वास पर आधारित है। अंतर केवल इतना है कि आधुनिक राज्य के पास सुदृढ़ प्रशासन, बैंकिंग व्यवस्था और कानून हैं जो उस विश्वास को बनाए रखते हैं।
इस दृष्टि से मुहम्मद बिन तुगलक को अपने समय से बहुत आगे का शासक कहा जा सकता है।
