विटामिन K की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि इसका कुछ भाग हमें भोजन से प्राप्त होता है जबकि इसका एक बड़ा भाग मानव शरीर के कोलन (बृहदान्त्र) में रहने वाले लाभकारी बैक्टीरिया द्वारा स्वयं निर्मित किया जाता है। यह तथ्य मानव शरीर और सूक्ष्मजीवों के बीच मौजूद सहजीवन (symbiosis) का उत्कृष्ट उदाहरण है।
विटामिन K का परिचय
विटामिन K वसा में घुलनशील (fat-soluble) विटामिनों के समूह से संबंधित है। इसका नाम जर्मन शब्द “Koagulation” से लिया गया है जिसका अर्थ है रक्त का थक्का बनना। इस नाम से ही इसके मुख्य कार्य का संकेत मिलता है।
विटामिन K के प्रमुख प्रकार
विटामिन K मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है:
विटामिन K₁ (फाइलोक्विनोन)
- यह हरी पत्तेदार सब्जियों जैसे पालक, पत्ता गोभी, ब्रोकली आदि में पाया जाता है।
- यह मुख्यतः पौधों से प्राप्त होता है।
विटामिन K₂ (मेनाक्विनोन)
- यह प्रकार मानव आंत में रहने वाले बैक्टीरिया द्वारा निर्मित किया जाता है।
- यही वह विटामिन K है जिसका निर्माण कोलन में होता है।
विटामिन K₃ (मेनाडायोन)
- यह एक कृत्रिम (synthetic) रूप है जिसका उपयोग कुछ औषधीय स्थितियों में किया जाता है।
इनमें से विटामिन K₂ का मानव स्वास्थ्य में विशेष महत्त्व है क्योंकि यह सीधे हमारी आंतों के सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों से जुड़ा हुआ है।
मानव पाचन तंत्र और कोलन का परिचय
मानव पाचन तंत्र एक लंबी नली के समान संरचना है जिसमें भोजन का पाचन, अवशोषण और अपशिष्ट निष्कासन होता है। यह मुख से शुरू होकर ग्रासनली, आमाशय, छोटी आंत और अंत में बड़ी आंत (कोलन) तक फैला होता है।
कोलन की संरचना और कार्य
- कोलन लगभग 1.5 मीटर लंबा होता है और इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
- अपचित भोजन से पानी और खनिज लवणों का अवशोषण
- मल का निर्माण और संग्रह
- आंतों में रहने वाले बैक्टीरिया के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करना
यहीं पर लाखों-करोड़ों की संख्या में बैक्टीरिया निवास करते हैं जिन्हें सामूहिक रूप से गट माइक्रोबायोटा कहा जाता है।
कोलन में रहने वाले बैक्टीरिया
मानव कोलन में लगभग 100 ट्रिलियन (10¹⁴) सूक्ष्मजीव रहते हैं। इनमें से अधिकांश बैक्टीरिया होते हैं जो हमारे लिए हानिकारक नहीं बल्कि अत्यंत उपयोगी होते हैं।
लाभकारी बैक्टीरिया की भूमिका
- कोलन के बैक्टीरिया निम्नलिखित कार्य करते हैं:
- अपचित कार्बोहाइड्रेट और फाइबर का किण्वन
- कुछ विटामिनों का निर्माण जैसे विटामिन K और कुछ B-समूह विटामिन
- रोगजनक (हानिकारक) जीवाणुओं से रक्षा
- प्रतिरक्षा तंत्र को सुदृढ़ बनाना
इन सभी कार्यों में विटामिन K का निर्माण एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
कोलन में विटामिन K का निर्माण कैसे होता है?
जब भोजन छोटी आंत से होकर बड़ी आंत (कोलन) में पहुँचता है तो उसमें उपस्थित कुछ अवशेष ऐसे होते हैं जिन्हें हमारा शरीर स्वयं पचा नहीं सकता। यही अवशेष कोलन के बैक्टीरिया के लिए ऊर्जा का स्रोत बनते हैं।
जैव रासायनिक प्रक्रिया
- कोलन में मौजूद बैक्टीरिया जैसे Bacteroides और E. coli कुछ जटिल यौगिकों का अपघटन करते हैं।
- इस प्रक्रिया के दौरान ये बैक्टीरिया मेनाक्विनोन (विटामिन K₂) का संश्लेषण करते हैं।
- निर्मित विटामिन K₂ आंत की दीवारों से अवशोषित होकर रक्त में पहुँच जाता है।
- रक्त के माध्यम से यह यकृत (लिवर) और अन्य अंगों तक पहुँचकर अपना कार्य करता है।
इस प्रकार, मानव शरीर और आंतों के बैक्टीरिया के बीच एक पारस्परिक लाभ का संबंध स्थापित होता है।
विटामिन K के प्रमुख कार्य
रक्त का थक्का बनाना
- विटामिन K रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया में शामिल कई प्रोटीनों के निर्माण के लिए आवश्यक होता है। इसके बिना मामूली चोट पर भी अत्यधिक रक्तस्राव हो सकता है।
हड्डियों का स्वास्थ्य
- विटामिन K कैल्शियम के सही उपयोग में मदद करता है जिससे हड्डियाँ मजबूत रहती हैं और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा कम होता है।
हृदय स्वास्थ्य
- यह रक्त वाहिकाओं में कैल्शियम के जमाव को रोकता है जिससे हृदय रोगों की संभावना कम होती है।
नवजात शिशुओं में भूमिका
नवजात शिशुओं में विटामिन K की कमी पाई जाती है। इसलिए जन्म के बाद उन्हें विटामिन K का इंजेक्शन दिया जाता है।
विटामिन K की कमी के कारण और प्रभाव
कमी के कारण
- आंतों के बैक्टीरिया का नष्ट होना (लंबे समय तक एंटीबायोटिक सेवन से)
- वसा के अवशोषण में बाधा
- यकृत रोग
कमी के लक्षण
- बार-बार रक्तस्राव
- घाव का देर से भरना
- हड्डियों का कमजोर होना
एंटीबायोटिक और विटामिन K
जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करता है तो ये दवाएँ हानिकारक बैक्टीरिया के साथ-साथ लाभकारी बैक्टीरिया को भी नष्ट कर देती हैं। परिणामस्वरूप, कोलन में विटामिन K का निर्माण कम हो जाता है जिससे कमी के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं।
आहार और विटामिन K
यद्यपि कोलन में बैक्टीरिया द्वारा विटामिन K का निर्माण होता है फिर भी आहार से इसकी पर्याप्त मात्रा लेना आवश्यक है। हरी पत्तेदार सब्जियाँ, सोयाबीन, डेयरी उत्पाद और कुछ किण्वित खाद्य पदार्थ इसके अच्छे स्रोत हैं।
