भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं। इसका सैद्धांतिक आधार भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में मिलता है जिसे भारतीय कला और नाट्य परंपरा का मूल ग्रंथ माना जाता है। समय के साथ-साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ विकसित हुईं। स्वतंत्र भारत में इन नृत्य शैलियों को औपचारिक पहचान और संरक्षण प्रदान करने का कार्य भारतीय संगीत नाटक अकादमी ने किया।
भारतीय संगीत नाटक अकादमी द्वारा वर्तमान में भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों को मान्यता दी गई है। ये शैलियाँ न केवल कला की दृष्टि से समृद्ध हैं बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता, क्षेत्रीय परंपराओं और ऐतिहासिक विकास को भी दर्शाती हैं।
भारतीय शास्त्रीय नृत्य की अवधारणा
भारतीय शास्त्रीय नृत्य वे नृत्य शैलियाँ हैं जो शास्त्रसम्मत नियमों पर आधारित हैं और जिनकी परंपरा गुरु–शिष्य परंपरा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ी है। इन नृत्यों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
नाट्यशास्त्र पर आधारित तकनीक
- अभिनय के चार प्रकार – आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्त्विक
- राग, ताल और लय का सुस्पष्ट प्रयोग
- भाव और रस सिद्धांत की प्रधानता
- धार्मिक, पौराणिक और आध्यात्मिक विषयवस्तु
भारतीय संगीत नाटक अकादमी की भूमिका
स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने भारतीय कला और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से भारतीय संगीत नाटक अकादमी की स्थापना की। इस अकादमी का मुख्य कार्य है:
- शास्त्रीय संगीत, नृत्य और नाटक को बढ़ावा देना
- कलाकारों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्रदान करना
- पारंपरिक कला रूपों का संरक्षण
- शोध, प्रशिक्षण और प्रलेखन को प्रोत्साहित करना
इसी संस्था ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य की आठ शैलियों को आधिकारिक मान्यता दी।
मान्यता प्राप्त 8 भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ
भरतनाट्यम
भरतनाट्यम तमिलनाडु की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैली है और इसे भारत की सबसे प्राचीन शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में गिना जाता है। इसका उद्गम मंदिरों में देवदासियों द्वारा किए जाने वाले सादिर नृत्य से माना जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
- त्रिभंगी और अरमंडी मुद्रा
- सशक्त पाद संचालन (फुटवर्क)
- शिव, विष्णु और देवी की कथाओं का चित्रण
- शुद्ध नृत्य (नृत्त), भावात्मक नृत्य (नृत्य) और अभिनय (नाट्य) का संतुलन
भरतनाट्यम ने आधुनिक काल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया है।
कथक
कथक उत्तर भारत की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैली है। इसका विकास मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली क्षेत्र में हुआ। कथक शब्द की उत्पत्ति कथा से मानी जाती है जिसका अर्थ है कहानी कहना।
मुख्य विशेषताएँ
- तीव्र और जटिल चक्कर
- घुंघरुओं की थाप
- ताल प्रधानता
- मुगल काल में विकसित दरबारी शैली
कथक में भक्ति परंपरा के साथ-साथ दरबारी सौंदर्य का भी अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
कथकली
कथकली केरल की अत्यंत भव्य और नाटकीय शास्त्रीय नृत्य शैली है। यह नृत्य–नाट्य का रूप है जिसमें रंग-बिरंगे वेशभूषा, भारी मेकअप और मुखाभिनय का विशेष महत्व होता है।
मुख्य विशेषताएँ
- रामायण और महाभारत की कथाएँ
- विस्तृत नेत्र और मुखाभिनय
- प्रतीकात्मक रंग योजना
- पूर्णतः पुरुष प्रधान परंपरा (परंपरागत रूप में)
कथकली भारतीय नृत्य परंपरा में नाटकीयता का सर्वोच्च उदाहरण मानी जाती है।
कुचिपुड़ी
कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश की शास्त्रीय नृत्य शैली है। इसका नाम कृष्णा जिले के कुचिपुड़ी गाँव से पड़ा। प्रारंभ में यह नृत्य नाट्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता था।
मुख्य विशेषताएँ
- नृत्य और नाट्य का संयोजन
- तरंगम शैली (पीतल की थाली पर नृत्य)
- वैष्णव भक्ति पर आधारित कथाएँ
- संवाद और गीत का प्रयोग
आज कुचिपुड़ी एक सशक्त मंचीय शास्त्रीय नृत्य के रूप में प्रतिष्ठित है।
ओडिसी
ओडिसी ओडिशा की प्राचीन शास्त्रीय नृत्य शैली है। इसका विकास मंदिरों में महारी परंपरा से हुआ।
मुख्य विशेषताएँ
- त्रिभंगी मुद्रा
- कोमल और लयात्मक गतियाँ
- जगन्नाथ और कृष्ण भक्ति
- शिल्पकला से प्रेरित मुद्राएँ
ओडिसी नृत्य को मूर्तिकला का जीवंत रूप कहा जाता है।
मणिपुरी
मणिपुरी मणिपुर राज्य की शास्त्रीय नृत्य शैली है। यह नृत्य अत्यंत कोमल, लयात्मक और आध्यात्मिक प्रकृति का होता है।
मुख्य विशेषताएँ
- रासलीला पर आधारित विषयवस्तु
- गोलाकार गतियाँ
- सौम्य भाव-प्रदर्शन
- कम आक्रामक पाद संचालन
मणिपुरी नृत्य भक्ति और सौंदर्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
मोहिनीअट्टम
मोहिनीअट्टम केरल की एकल महिला शास्त्रीय नृत्य शैली है। इसका नाम मोहिनी (आकर्षक नायिका) से लिया गया है।
मुख्य विशेषताएँ
- लास्य प्रधान नृत्य
- सफेद और सुनहरे परिधान
- सौम्य और तरल गतियाँ
- विष्णु और कृष्ण कथाएँ
यह नृत्य स्त्री सौंदर्य और कोमल भावों की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है।
सत्त्रिया
सत्त्रिया असम की शास्त्रीय नृत्य शैली है जिसे अपेक्षाकृत हाल ही में शास्त्रीय नृत्य का दर्जा प्राप्त हुआ। इसका विकास वैष्णव संत शंकरदेव द्वारा स्थापित सत्रों में हुआ।
मुख्य विशेषताएँ
- वैष्णव भक्ति परंपरा
- अंकिया नाट पर आधारित
- समूह और एकल दोनों रूप
- आध्यात्मिक विषयवस्तु
सत्त्रिया नृत्य ने असम की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया है।
शास्त्रीय नृत्य और भारतीय संस्कृति
इन आठों शास्त्रीय नृत्य शैलियों के माध्यम से भारत की भाषाई, धार्मिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता स्पष्ट रूप से झलकती है। प्रत्येक नृत्य शैली अपने क्षेत्र की लोक परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक जीवन से जुड़ी हुई है फिर भी सभी का शास्त्रीय आधार एक समान है।
