इन्हीं पाचक रसों में पित्त (Bile) का विशेष स्थान है। पित्त का निर्माण यकृत (Liver) में होता है जो मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि भी है। यद्यपि पित्त स्वयं कोई एंजाइम नहीं है फिर भी वसा के पाचन और अवशोषण में इसकी भूमिका अनिवार्य मानी जाती है।
यकृत (Liver) का परिचय
यकृत मानव शरीर का सबसे बड़ा आंतरिक अंग एवं ग्रंथि है। यह उदर गुहा के दाएँ ऊपरी भाग में स्थित होता है। यकृत का भार लगभग 1.2 से 1.5 किलोग्राम होता है और यह अनेक महत्वपूर्ण कार्य करता है जैसे:
पित्त का निर्माण
- विषैले पदार्थों का निष्क्रियकरण
- पोषक तत्वों का भंडारण
- रक्त का शुद्धिकरण
- चयापचय क्रियाओं का नियंत्रण
इन सभी कार्यों में पित्त का निर्माण यकृत का एक प्रमुख और विशिष्ट कार्य है।
पित्त (Bile) क्या है?
पित्त एक पीले-हरे रंग का क्षारीय (Alkaline) द्रव होता है। यह यकृत की कोशिकाओं द्वारा निरंतर निर्मित किया जाता है। पित्त में निम्न प्रमुख घटक पाए जाते हैं:
- जल (Water)
- पित्त लवण (Bile Salts)
- पित्त वर्णक (Bile Pigments – बिलीरुबिन, बिलिवर्डिन)
- कोलेस्ट्रॉल
- फॉस्फोलिपिड
- इलेक्ट्रोलाइट्स
पित्त का pH सामान्यतः 7.5 से 8.5 के बीच होता है जिससे यह अम्लीय आमाशयी रस को निष्क्रिय करने में सहायक होता है।
पित्त का निर्माण यकृत में कैसे होता है?
पित्त का निर्माण यकृत की हेपेटोसाइट कोशिकाओं (Liver Cells) में होता है। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है चाहे भोजन ग्रहण किया गया हो या नहीं।
पित्त निर्माण की प्रक्रिया
- यकृत कोशिकाएँ रक्त से आवश्यक पदार्थों को ग्रहण करती हैं।
- इन पदार्थों से पित्त लवण, वर्णक और अन्य घटक बनते हैं।
- निर्मित पित्त सूक्ष्म नलिकाओं (Bile Canaliculi) में एकत्र होता है।
- ये नलिकाएँ मिलकर यकृत पित्त नली (Hepatic Duct) बनाती हैं।
इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि पित्त का वास्तविक निर्माण स्थल यकृत ही है।
पित्ताशय (Gall Bladder) की भूमिका
हालाँकि पित्त का निर्माण यकृत में होता है लेकिन उसका संग्रह और सघनन (Concentration) पित्ताशय में होता है।
- पित्ताशय एक छोटी थैलीनुमा संरचना है।
- यह यकृत के नीचे स्थित होती है।
- भोजन न होने पर पित्त पित्ताशय में संग्रहित रहता है।
- वसायुक्त भोजन के ग्रहण पर पित्त छोटी आंत में छोड़ दिया जाता है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पित्ताशय पित्त का निर्माण नहीं करता बल्कि केवल उसका भंडारण करता है।
पित्त का पाचन में महत्व
पित्त का प्रमुख कार्य वसा (Fat) के पाचन में सहायता करना है।
वसा का इमल्सीकरण (Emulsification)
- पित्त लवण बड़ी वसा बूंदों को छोटी-छोटी बूंदों में तोड़ देते हैं।
- इससे वसा का सतही क्षेत्रफल बढ़ जाता है।
- परिणामस्वरूप लाइपेज एंजाइम आसानी से वसा पर कार्य कर पाता है।
अम्लीय रस का निष्क्रियकरण
- आमाशय से आने वाला भोजन अम्लीय होता है।
- पित्त क्षारीय होने के कारण इस अम्लीयता को कम करता है।
- इससे छोटी आंत की श्लेष्मिक परत सुरक्षित रहती है।
पित्त और वसा में घुलनशील विटामिन
पित्त का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य है:
- वसा में घुलनशील विटामिनों (A, D, E और K) के अवशोषण में सहायता करना।
यदि पित्त का स्राव बाधित हो जाए तो इन विटामिनों की कमी हो सकती है जिससे:
- रतौंधी
- हड्डियों की कमजोरी
- रक्त का थक्का बनने में समस्या
- रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
पित्त वर्णक और अपशिष्ट निष्कासन
पित्त में पाए जाने वाले पित्त वर्णक बिलीरुबिन और बिलिवर्डिन रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन के अपघटन से बनते हैं।
- ये वर्णक पित्त के साथ आंत में पहुँचते हैं।
- अंततः मल के साथ शरीर से बाहर निकल जाते हैं।
- मल का भूरा रंग इन्हीं वर्णकों के कारण होता है।
इस प्रकार पित्त शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में भी सहायक होता है।
यकृत और पित्त : आपसी संबंध
यकृत और पित्त का संबंध अत्यंत घनिष्ठ है:
- यकृत पित्त का निर्माण करता है।
- पित्त यकृत के चयापचय कार्यों का प्रत्यक्ष परिणाम है।
- यकृत की किसी भी बीमारी का सीधा प्रभाव पित्त निर्माण पर पड़ता है।
उदाहरण के लिए:
- हेपेटाइटिस
- सिरोसिस
- फैटी लिवर
इन रोगों में पित्त का स्राव प्रभावित हो सकता है।
पित्त से संबंधित विकार
पित्त के निर्माण या प्रवाह में बाधा उत्पन्न होने पर कई रोग हो सकते हैं।
पीलिया (Jaundice)
- पित्त वर्णक रक्त में जमा हो जाते हैं।
- त्वचा और आँखें पीली हो जाती हैं।
पित्त पथरी
- पित्त में कोलेस्ट्रॉल या वर्णकों का जमाव हो जाता है।
- इससे तीव्र दर्द और पाचन समस्या होती है।
वसा पाचन में समस्या
- पित्त की कमी से वसा का पाचन बाधित हो जाता है।
- दस्त और वजन कम होने की समस्या हो सकती है।
पित्त और आधुनिक जीवनशैली
आज की आधुनिक जीवनशैली भी पित्त एवं यकृत के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है:
- अत्यधिक तैलीय भोजन
- शराब का सेवन
- अनियमित खान-पान
- मोटापा
ये सभी कारक यकृत पर दबाव डालते हैं जिससे पित्त निर्माण प्रभावित हो सकता है।
यकृत और पित्त को स्वस्थ रखने के उपाय
पित्त के समुचित निर्माण के लिए यकृत का स्वस्थ रहना आवश्यक है।
प्रमुख उपाय
- संतुलित एवं हल्का आहार
- तैलीय और जंक फूड से परहेज
- पर्याप्त जल सेवन
- नियमित व्यायाम
- शराब से दूरी
इन उपायों से यकृत स्वस्थ रहता है और पित्त का निर्माण सामान्य रूप से होता है।
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