ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उत्पत्ति
पदयानी का आरम्भ बहुत प्राचीन माना जाता है। कुछ शोध और लोककथाएँ इसे ब्राह्मणवाद के आगमन से भी पूर्वकालीन देव-पूजा की द्रविड़ परंपराओं से जोड़ती हैं। शब्द ‘पदयानी’ का भावशः अर्थ “सेनाओं की पंक्ति” या “युद्ध-दल” से जुड़ा बताया जाता है। कुछ मतों में इसे कलारी (कर्नाटक/केरल की पारंपरिक मार्शल आर्ट) के सैन्य मार्शल चालों का लोक रूप कहा जाता है। ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय परंपराओं से संकेत मिलता है कि पदायनी विभिन्न सामाजिक समूहों जैसे नायर, कणियार और कुछ विशिष्ट पारंपरिक समुदायों के सहयोग से विकसित हुई जहाँ कुछ समुदाय मुखौटे और गाने बनाते थे जबकि अन्य नृत्य का प्रदर्शन करते थे। इतिहास और लोकगाथाओं के मेल से पदायनी को देव-पूजा, सामुदायिक उपचार (exorcism या मनो-आध्यात्मिक उपचार) और उत्सव का एक सम्मिलित रूप माना जाता है।
मिथक और धार्मिक महत्व: दारिकासुर और भद्रकाली की कथा
पदयानी के नाभिक में देवी भद्रकाली की कथा है। प्राचीन पुराणिक आख्यानों में भद्रकाली ने असुर दारिका (Darika) का वध किया था। किंवदंती के अनुसार देवी की प्राणवायु में क्रोध और शक्ति ऐसी थी कि उसे शांत करने और देवी की विजय का उत्सव मनाने के लिये लोक ने विविध अनुष्ठान विकसित किये। पदायनी उन्हीं अनुष्ठानों में से एक है। इस नृत्य-प्रदर्शन का उद्देश्य भद्रकाली की उग्रता को नियंत्रित करना, गाँव/समुदाय की रक्षा करना और देवी का आशीर्वाद प्राप्त करना माना जाता है। पदायनी की प्रस्तुतियाँ न केवल देवी-पूजा का रूप हैं बल्कि समुदायिक मनोवैज्ञानिक उपचार के कार्य भी करती थीं। उदाहरण के लिये मानसिक अस्वस्थता या अबोध व्याधियों में सामाजिक उपचार के तौर पर इसे महत्व दिया जाता था।
पदायनी का आयोजन और कालक्रम
पदयानी सामान्यतः भद्रकाली मंदिरों में रात में की जाती है। आयोजन अवधि जगह और स्थानीय परंपरा के अनुसार भिन्न होती है। कुछ स्थानों पर यह 7 दिन तक चल सकती है तो कहीं-कहीं यह 28 दिनों तक भी विस्तृत रहती है और कभी-कभी कुछ विशेष कोरम आयोजन हर पाँच साल में होते हैं। यह आयोजन दिसंबर से मई के बीच किसी भी समय हो सकता है। परंपरागत रूप से इसे मास-पर्व (कुंभ मास, माघ आदि) से जोड़ा जाता है और स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्धारित किया जाता है। अधिकांश प्रकरणों में कई गांव और कर्मकार मिलकर त्योहार का आयोजन करते हैं और कई बार अलग-अलग परिवारों या ‘कारा’ (किसी क्षेत्र की सामाजिक इकाई) के पास कुछ विशिष्ट कोलम (मुखौटे) प्रस्तुत करने के अधिकार होते हैं।
कोलम (Kolam): मुखौटे और उनकी कला
पदयानी का सबसे आकर्षक पहलू उसके बड़े-बड़े रंगीन और परिष्कृत मुखौटे (कोलम) हैं। कोलम लकड़ी, पत्तियों, रंगों और प्राकृतिक सामग्री से बनाए जाते हैं और इन्हें विशिष्ट चरित्रों का रूप देने हेतु चित्रित व सजाया जाता है। प्रमुख कोलम-प्रकारों में यक्षी (Yakshi), पक्षी-प्रकार (Pakshi), घोड़ा (Kuthira), भैरवी, काल (Kalan), मरुत (Marutha) आदि आते हैं। कोलम का आकार बहुत बड़ा और भारी होता है। कई बार कलाकारों को इन्हें सिर पर संतुलित करके नाचना पड़ता है। इसलिए विशेष कौशल और प्रशिक्षण आवश्यक होता है। कोलम न केवल रूपात्मक होते हैं बल्कि इनमें निहित रंग-चयन, चेहरे के भाव और आकृतियाँ देवी, भूत-प्रेत, पशु और मिथकीय पात्रों को दर्शाती हैं। यहाँ की लोकचित्रकला और शिल्पकला पात्रों के मनोवैज्ञानिक अर्थ और समुदायिक प्रथा को भी बयां करती है।
नृत्य, अभिनय तथा संगीत की संरचना
पदयानी में नाटकीय और नृत्यात्मक तत्वों का सूक्ष्म समन्वय रहता है। कलाकार केवल शारीरिक नृत्य ही नहीं करते। वे मुखौटे पहनकर विशेष चाल-ढाल, हावभाव और तमाम लयबद्ध गानों के साथ देवी के जीवन, युद्ध और दिव्य घटनाओं का अभिनय करते हैं। संगीत में पारंपरिक ढोल, घंटे, शंख और लोकगायन का समावेश होता है। गायन सामान्यतः देवी-गाथा, भक्ति-सप्तक और संवाद-रूपी छंदों में होता है जो प्रदर्शन की घटनाक्रम को आगे बढ़ाते हैं। नृत्य का ताल-लय अक्सर ग्रामीण ताल के प्रकार पर आधारित होता है और कलाकारों का अभिनय ऐकरूप, ग्रोव व सामूहिक एक्शन से भरपूर होता है। प्रदर्शन के दौरान "विनोदम" (हास्य/मनोरंजन) भी देखा जाता है जो दर्शकों को जोड़ने और धार्मिक माहौल को सहज बनाने का काम करता है।
प्रसिद्ध केंद्र और स्थानीय विविधताएँ
पदयानी मूलतः मध्य त्रावणकोर क्षेत्र की परिघटना मानी जाती है। इसमें पथानमथिट्टा (Pathanamthitta), कोट्टायम (Kottayam), अलप्पुझा (Alappuzha) और कोल्लम (Kollam) के कुछ हिस्से प्रमुख हैं। कुछ मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं जिनमें कुरंपला (Kurampala), कलूप्पारा (Kallooppara), कडलिमंगलम (Kadalimangalam) इत्यादि शामिल हैं। प्रत्येक स्थान की अपनी विशिष्ट कोलम-शैली, आयोजकीय परंपरा और नाट्य-संरचना होती है। उदाहरण के लिये कलूप्पारा पदयानी और कुरंपला पदयानी को स्थानीय महत्त्व और अलग रीति-रिवाजों के कारण विशेष रूप से जाना जाता है। ये विविधताएँ दर्शाती हैं कि पदायनी एक एकरूप कला नहीं बल्कि क्षेत्रीय भाव-भेदों वाला जीवंत लोक-रूप है।
प्रस्तुतियाँ: क्रम और मुख्य घटक
पदयानी के आयोजन क्रम में आम तौर पर निम्नलिखित घटक आते हैं। (स्थानीय परंपरा के अनुसार इनमें फेरबदल संभव है):
- प्रस्थान और उद्घाटन (Kudiyattam/आरम्भिक अनुष्ठान): मंदिर में आरंभिक पूजन, देवी को आमंत्रण और पारंपरिक मंत्र-उच्चारण।
- कोलम-प्रदर्शन (Kolam Thullal): बड़े मुखौटों के साथ नायकों/चरित्रों का परेड जैसा प्रस्तुतिकरण।
- नृत्य और ताल (Vellathullal/Tullal): संगीत के साथ सामूहिक नृत्य।
- मास्क/विनोद (Vinodam): हल्की-फुल्की रंग-रस प्रस्तुति, दर्शकों के साथ संवाद।
- अंतिम अनुष्ठान (Adipoli/शांतिदान): देवी की पूजा-प्रार्थना, आशीर्वचन और समुदाय के लिये समर्पण।
यह सही तालमेल, सामुदायिक सहयोग और परंपरा-पालन से संभव होता है। इन प्रस्तुतियों का उद्देश्य न केवल देवी को प्रसन्न करना है बल्कि सामाजिक मनोबल और सामुदायिक एकता को भी सशक्त करना है।
पदायनी की सामुदायिक और मनोवैज्ञानिक भूमिका
पदयानी का महत्व केवल धार्मिक नहीं है। यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी समुदाय के लिये आवश्यक रहा है। पारंपरिक तौर पर पदायनी को सामुदायिक उपचार (psychic healing) के रूप में भी देखा जाता था। ऐसी परिस्थितियाँ जहाँ व्यक्ति मानसिक आज़माइशों, भय, या सामाजिक तनाव का शिकार था वहां यह अनुष्ठान सामूहिक सहानुभूति, शुद्धि और समर्पण का माध्यम बनता था। साथ ही यह युवा पीढ़ी के लिये सांस्कृतिक शिक्षा का माध्यम है। वे लोककथाएँ, पारंपरिक गीत और शिल्प कौशल अगली पीढ़ी को हस्तांतरित होते देखते हैं। यह आर्थिक रूप से भी स्थानीय शिल्पकारों, मुखौटा-निर्माताओं और कलाकारों के लिये रोजगार का स्रोत बनता है।
कोलम-निर्माण: शिल्प और तकनीकें
कोलम बनाने की प्रक्रिया जटिल और समय गहन होती है। पारंपरिक रूप में यह प्राकृतिक सामग्री जैसे ताड़-पत्तियाँ, लौंग-छाल, लकड़ी के हिस्से, रेशम या कपड़ा, और प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर बनाई जाती थी। कलाकार पहले ढांचे का फ्रेम बनाते हैं। फिर उसे पेपर-मैचे, रंग और सजावट से सम्पन्न करते हैं। मुखौटों में चेहरे के भाव, आँखों का बनावट और हर छोटा डिटेल लोक-कथा के अनुरूप बनता है। आधुनिक समय में कुछ स्थानों पर साधन उपलब्धता और टिकाऊपन के कारण नए पदार्थों का उपयोग भी देखा गया है पर पारंपरिक शिल्प अभी भी अपनी जगह बनाए हुए है।
कलात्मक अर्थ और प्रतीकवाद
पदयानी में प्रयुक्त रंग, आकृति और पात्र सभी धार्मिक तथा सांस्कृतिक अर्थों से परिपूर्ण होते हैं। उदाहरण के लिये लाल और काला रंग देवी की उग्रता और शक्ति का संकेत दे सकते हैं जबकि पशु-रूप (जैसे घोड़ा) पारंपरिक युद्ध-रूपक और गति का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुखौटे/कोलम में कभी-कभी जनजातीय डिज़ाइन भी देखने को मिलते हैं जो स्थानीय प्रकृति-धारणाओं और इतिहास को प्रतिबिंबित करते हैं। एक अर्थ में पदायनी लोक-चित्रकला, शिल्प और नाट्य का सम्मिलित प्रतीक है जो सामाजिक स्मृति और सामुदायिक पहचान को बनाए रखता है।
संरक्षण, पर्यटन और आज की चुनौतियाँ
आज के समय में पदायनी को संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता है। जैसे कई लोक-रूपों के साथ आधुनिकरण, शहरीकरण और युवा पीढ़ी की रुचि में कमी इस कला के लिये चुनौती प्रस्तुत करती है। दूसरी ओर, पर्यटन के बढ़ते रुचि और राज्य स्तर के प्रमोशन से पदायनी को व्यापक दर्शक-समूह मिला है।
आधुनिक प्रयोग और पुनरुत्थान प्रयास
कई संगठनों, लोक-शैक्षिक समूहों और कला-प्रेमियों ने पदायनी के पुनरुत्थान तथा संरक्षण हेतु पहल की है। इनमें दस्तावेजीकरण, कार्यशालाएँ, स्कूलों में लोक कला पाठ्यक्रम, और राज्य-स्तरीय समारोहों में प्रदर्शन शामिल हैं। कुछ युवा कलाकार पारंपरिक कोलम-निर्माण सीखकर अपनी आर्थिक संभावनाएँ बढ़ा रहे हैं जबकि कुछ शोधकर्ता और लोक-कलाकार इतिहास और तकनीक पर लेखन और फिल्म-फुटेज तैयार कर रहे हैं। इन प्रयासों से यह उम्मीद बनी हुई है कि पदायनी न केवल जीवित रहेगी बल्कि बदलते समाज में अपनी प्रासंगिकता भी बनाए रखेगी।
पदायनी का वैश्विक और शैक्षिक महत्व
लोक-नृत्य और अनुष्ठान कलाएँ वैश्विक सांस्कृतिक अध्ययन के लिये अमूल्य हैं। ये न केवल कलात्मक रूप दिखाती हैं बल्कि समाज के मूल्य, इतिहास, सामुदायिक संरचना और विश्वासों को भी उजागर करती हैं। पदायनी जैसी कलाएँ न केवल नृत्यशास्त्रियों और नृत्य-प्रेमियों के लिये शोध का विषय हैं बल्कि मानवविज्ञान, लोक-शिल्प, मनोविज्ञान और धार्मिक अध्ययन के लिये भी उपयोगी स्रोत हैं। शैक्षणिक संस्थानों में इन कलाओं का समुचित अध्ययन और पाठ्यक्रम में समावेश सांस्कृतिक संरक्षण को मजबूत करेगा।
