चेराव में बाँस की छड़ों के बीच तालबद्ध ढंग से नृत्य करते कलाकार जिस सटीकता, संतुलन और सौंदर्य का प्रदर्शन करते हैं वह दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। यह नृत्य सदियों से मिज़ो समुदाय के सामाजिक–धार्मिक जीवन का अभिन्न अंग रहा है और आज भी उत्सवों, विवाह समारोहों, तथा सांस्कृतिक आयोजनों में पूरे उत्साह से किया जाता है।
चेराव नृत्य की उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
चेराव नृत्य की उत्पत्ति को लेकर कई लोककथाएँ प्रचलित हैं। परंपरागत मान्यता के अनुसार इसका आरंभ प्राचीन काल में उस समय हुआ जब मिज़ो समाज प्रकृति के साथ घनिष्ठ संबंध रखता था। बाँस, जो मिज़ो जीवन में घर, खेती, संगीत व दैनिक उपयोग की वस्तुओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है उसी बाँस को नृत्य की केंद्रीय वस्तु बनाया गया।
कुछ विद्वानों का मत है कि चेराव नृत्य प्रारंभ में धार्मिक–अनुष्ठानिक प्रकृति का था। इसे देवी–देवताओं को प्रसन्न करने, अच्छी फसल की कामना और समुदाय की समृद्धि के लिए प्रस्तुत किया जाता था। समय के साथ यह नृत्य सामाजिक उत्सवों और सामूहिक आनंद का माध्यम बन गया।
“चेराव” शब्द का अर्थ
“चेराव” शब्द मिज़ो भाषा से लिया गया है। माना जाता है कि यह शब्द बाँस की छड़ों के आपसी टकराव से उत्पन्न ध्वनि और ताल से संबंधित है। इस नृत्य में बाँस की लंबी छड़ें ज़मीन पर रखी जाती हैं और दो या अधिक लोग उन्हें निश्चित लय में खोलते-बंद करते हैं। इसी लय पर नर्तक–नर्तकियाँ फुर्ती से कदम रखते हुए नृत्य करते हैं।
बाँस का सांस्कृतिक महत्व
मिज़ो समाज में बाँस केवल एक वनस्पति नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
- आवास निर्माण: घर, बाड़, छप्पर
- कृषि उपकरण: टोकरी, औज़ार
- संगीत व नृत्य: वाद्य और नृत्य सामग्री
- दैनिक जीवन: बर्तन, फर्नीचर
चेराव नृत्य में बाँस का उपयोग इस सांस्कृतिक गहराई को दर्शाता है। बाँस की लय, कठोरता और लचीलापन मिज़ो समाज की सामूहिक शक्ति और अनुशासन का प्रतीक है।
चेराव नृत्य की संरचना
चेराव नृत्य मुख्यतः तीन घटकों पर आधारित होता है:
- बाँस की छड़ें
- ताल और संगीत
- नर्तक–नर्तकियों की गतियाँ
बाँस की छड़ें
- आमतौर पर 6 से 8 बाँस की लंबी छड़ें ज़मीन पर समानांतर रखी जाती हैं। कुछ लोग बैठकर या झुककर इन छड़ों को हाथों से पकड़ते हैं और लय में खोलते–बंद करते हैं।
ताल और संगीत
- प्रारंभिक काल में केवल बाँस की छड़ों से उत्पन्न ताल ही पर्याप्त मानी जाती थी। बाद में ढोल, नगाड़ा और लोकगीतों का समावेश हुआ। ताल की गति धीरे–धीरे बढ़ती है जिससे नृत्य में रोमांच उत्पन्न होता है।
नृत्य की गतियाँ
- नर्तक–नर्तकियाँ बाँस की छड़ों के बीच कदम रखते हुए आगे–पीछे, दाएँ–बाएँ और गोलाकार गतियाँ करते हैं। यह नृत्य अत्यंत सावधानी और अभ्यास की माँग करता है क्योंकि एक छोटी–सी चूक भी चोट का कारण बन सकती है।
वेशभूषा और अलंकरण
चेराव नृत्य की सुंदरता वेशभूषा से और भी निखर जाती है।
महिलाओं की वेशभूषा
- महिलाएँ पारंपरिक पुआन (Puan) पहनती हैं जो रंग–बिरंगे बुने हुए वस्त्र होते हैं। इनमें लाल, काला और सफेद रंग प्रमुख होते हैं। सिर पर फूल, हल्के आभूषण और सरल साज–सज्जा नृत्य की गरिमा को बढ़ाती है।
पुरुषों की वेशभूषा
- पुरुष भी पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं जिनमें कमरबंद, रंगीन शॉल और कभी–कभी सिर पर पगड़ी शामिल होती है। उनकी भूमिका बाँस संभालने और ताल बनाने में भी महत्वपूर्ण होती है।
सामाजिक और सामुदायिक महत्व
चेराव नृत्य केवल मंचीय प्रदर्शन नहीं है बल्कि सामुदायिक सहभागिता का प्रतीक है।
- सामूहिक अनुशासन: सभी कलाकारों का ताल में रहना
- सहयोग की भावना: बाँस पकड़ने वालों और नर्तकों के बीच तालमेल
- पीढ़ीगत हस्तांतरण: बुज़ुर्ग युवा पीढ़ी को प्रशिक्षण देते हैं
यह नृत्य समुदाय में एकता, विश्वास और सामूहिक आनंद को सुदृढ़ करता है।
उत्सवों और अवसरों पर चेराव
चेराव नृत्य मुख्यतः निम्न अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है:
- चपचार कुट – वसंत और फसल उत्सव
- विवाह समारोह
- सामुदायिक पर्व और स्वागत समारोह
- राज्य एवं राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सव
चपचार कुट के दौरान चेराव नृत्य का विशेष महत्व होता है जब पूरा समाज उत्सव के रंग में रंग जाता है।
चेराव और आधुनिक मंच
आज चेराव नृत्य केवल मिज़ोरम तक सीमित नहीं रहा।
- राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच
- अंतरराष्ट्रीय लोक–नृत्य उत्सव
- शैक्षणिक संस्थानों के सांस्कृतिक कार्यक्रम
आधुनिक मंचों पर इसे प्रस्तुत करते समय पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने के साथ–साथ प्रकाश, ध्वनि और कोरियोग्राफी में नए प्रयोग भी किए जाते हैं।
प्रशिक्षण और अभ्यास
चेराव नृत्य सीखने के लिए कठोर अभ्यास आवश्यक है।
- ताल–बोध: लय को समझना
- शारीरिक संतुलन: फुर्ती और लचीलापन
- सामूहिक अभ्यास: समूह के साथ तालमेल
आज मिज़ोरम में कई सांस्कृतिक संस्थाएँ और विद्यालय इस नृत्य का प्रशिक्षण देते हैं।
चेराव का सांस्कृतिक प्रतीकवाद
चेराव नृत्य मिज़ो समाज के मूल्यों को दर्शाता है:
- अनुशासन
- साहस और आत्मविश्वास
- प्रकृति के साथ सामंजस्य
- सामूहिक जीवन की भावना
बाँस की छड़ों के बीच नृत्य करना जीवन की चुनौतियों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रतीक भी माना जाता है।
संरक्षण और भविष्य
आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद चेराव नृत्य आज भी जीवंत है।
- राज्य सरकार द्वारा संरक्षण
- सांस्कृतिक अकादमियों का सहयोग
- पर्यटन के माध्यम से वैश्विक पहचान
यह आवश्यक है कि पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखते हुए नई पीढ़ी को इससे जोड़ा जाए ताकि यह अनमोल धरोहर आने वाले समय में भी सुरक्षित रहे।
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