जगोई और थाबल चोंगबा किस भारतीय राज्य के प्रसिद्ध नृत्य हैं?

जगोई और थाबल चोंगबा मणिपुर के प्रसिद्ध नृत्य हैं। मणिपुर, भारत के पूर्वोत्तर में स्थित यह छोटा राज्य नृत्य-संस्कृति की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध है। यहाँ के नृत्य के रूप सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि सामाजिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान के वाहक हैं। थाबल चोंगबा को अक्सर “moonlight dance” या चांदनी रात में होने वाला नृत्य माना जाता है और यह विशेष रूप से याओशांग (Yaoshang) त्योहार से जुड़ा है।

जगोई और थाबल चोंगबा मणिपुर के प्रसिद्ध नृत्य हैं।

मणिपुर की नृत्य परंपरा विविध आयामों वाली है। यहाँ शास्त्रीय, अर्ध-शास्त्रीय और लोक-नृत्य सभी समृद्धि से व्याप्त हैं। शास्त्रीय शैली में जसि लोक-परम्पराओं का समावेश और उनके आध्यात्मिक-सांस्कृतिक स्वरूप प्रमुख होते हैं। लोकनृत्य जनजीवन, फसल-त्योहार, विवाह और सामाजिक मेलजोल के अवसरों पर परिणित होते हैं। जगोई और थाबल चोंगबा भी इन्हीं परंपराओं के उत्कृष्ट उदाहरण हैं जहाँ जगोई अधिकतर पारंपरिक और शास्त्रीय संदर्भों में मिलता है वहीं थाबल चोंगबा सामुदायिक मेलजोल और त्योहारों की जीवंत अभिव्यक्ति है।

जगोई (Jagoi): परिभाषा और इतिहास

नाम और अर्थ

‘जगोई’ शब्द का प्रयोग मणिपुरी नृत्य-परंपरा के भीतर कई नृत्य रूपों के लिए किया जाता है। कभी-कभी यह शब्द व्यापक रूप में मणिपुरी नृत्य (Manipuri dance) के कुछ हिस्सों को संदर्भित करता है। विशेषकर उन नृत्य-अनुष्ठानों को जो मंदिरों और धार्मिक आयोजनों से जुड़े होते हैं। जगोई में लय, शालीनता और कोमलता का समन्वय मिलता है। यह मणिपुरी नृत्य की सौम्य और बहु-रूपीय प्रवृत्ति को दर्शाता है।

जगोई की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जगोई की जड़ें मणिपुरी सांस्कृतिक-धार्मिक जीवन में गहरी हैं। मणिपुर के पारंपरिक नृत्य-रूपों का विकास सदियों में हुआ। स्थानीय अनुष्ठान, देवी-देवताओं की पूजा पद्धतियाँ, और वैष्णव धर्म के प्रभाव ने इन्हें आकार दिया। ब्राह्मणिक शास्त्रीय परंपराओं की तरह जगोई को भी मंदिर-प्रसंगों, रासलीला के प्रदर्शन और स्थानीय रीति-रिवाज़ों में स्थान मिला। जगोई का समकालीन स्वरूप कई तरह के लोक-रूपों और शास्त्रीय प्रस्तुति शैलियों के संगम से विकसित हुआ है।

जगोई की तकनीक और शैली

आंदोलन और मुद्रा
  • जगोई में नर्तकों के हाव-भाव शांत, नियंत्रित और स्त्रीलिंग लास्य प्रधान होते हैं। चलने-घूमने के तरीके में कोमलता और संतुलन का विशेष स्थान होता है। शरीर के छोटे-छोटे झटके, कलाई और उंगली के सूक्ष्म संकेत, और धीमी, तरल पाद-गतियाँ इस शैली की पहचान हैं। चेहरे के भाव (अभिनय) में भी संयम रहता है।अत्यधिक नाटकीयता की जगह सूक्ष्म भावाभिव्यक्ति को महत्व दिया जाता है।
रचना और संरचना
  • जगोई प्रस्तुतियाँ अक्सर नाटकीय कथानक या धार्मिक भावों पर आधारित होती हैं। इनमें रस-भावना (rasa-bhava) का संचार विषद ढंग से किया जाता है। प्रेम-भाव (श्रृंगार), भक्ति, करुणा आदि भाव प्रमुख रूप से प्रकट किए जाते हैं। रचना में धीरगति, संगीत की लय के साथ तालमेल और नर्तकियों के बीच सामूहिक समन्वय शामिल होता है।
संगीत और वाद्य
  • जगोई के साथ पारंपरिक मणिपुरी वाद्य जैसे ढोल, पाखावाज, बाँसुरी और कुछ धार्मिक गीत जुड़े होते हैं। संगीत सामान्यतः मधुर और शांत स्वरों में रहता है ताकि नृत्य के कोमल स्वरूप को समर्थन मिले। गायन में अक्सर स्थानीय बोली और धार्मिक श्लोक/गीतों का समावेश होता है।
वेशभूषा (Costume)
  • जगोई में पहना जाने वाला वस्त्र परंपरागत और सूक्ष्म होता है। रूढ़िवादी शास्त्रीय प्रस्तुतियों में महिलाओं द्वारा सजी-धजी सिल्क साड़ियाँ, गहने और अनूठी पगड़ी/शिरो-आभूषण देखने को मिलते हैं। रासलीला में खास ‘पोट्लोई’ जैसी विशिष्ट स्कर्ट दिखाई देती है। हालांकि पोट्लोई का प्रयोग विशेष नाटकीय (Raslila) प्रस्तुतियों तक ही सीमित होता है। साधारण जगोई स्टाइल में सादा परंतु सुंदर परिधान पसंद किए जाते हैं।

जगोई के प्रसिद्ध रूप और उप-शैलियाँ

मणिपुरी नृत्य-परंपरा में कई उप-रूप हैं जैसे रसलीला (Raslila), क्रिएचर आधारित नृत्य, देवता-सम्बंधित उत्सव-नृत्य आदि। जगोई की कुछ उप-शैलियाँ धार्मिक कथानक (जैसे कृष्ण-राधा की कथाएँ) पर केंद्रित होती हैं तो कुछ स्थानीय मानस और प्राकृतिक जीवन के अनुष्ठानों को दर्शाती हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि जगोई एक ठोस एकल शैली नहीं बल्कि नृत्य का एक समूह है जो साझा सौंदर्य और तकनीकी तत्वों के आधार पर परिभाषित होता है।

थाबल चोंगबा (Thabal Chongba): परिभाषा और ऐतिहासिक संदर्भ

नाम और अर्थ

‘थाबल चोंगबा’ का तात्पर्य है चांदनी रात में नृत्य करना। यह पारंपरिक मणिपुरी लोकनृत्य खासकर याओशांग त्यौहार के दौरान देखा जाता है। थाबल (Thabal) का अर्थ चाँद/चाँदनी से जोड़ा जा सकता है और चोंगबा (Chongba) का अर्थ नृत्य/घुमावदार गतिविधि है। यह नृत्य सामूहिक सर्कल-फॉर्मेशन में किया जाता है जहाँ लड़के और लड़कियाँ हाथ पकड़कर गोल-गोल घूमते हुए नाचते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

थाबल चोंगबा का इतिहास लोक-जीवन में मेलजोल और ऋतुओं के आधार पर विकसित हुआ। खासकर वसंत-त्योहार याओशांग (Yaoshang) के साथ इसका गहरा सम्बन्ध है। इस त्योहार में समुदाय मिलकर पाँच दिनों तक विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियाँ आयोजित करता है और थाबल चोंगबा इसका महत्वपूर्ण आकर्षण होता है। परम्परागत रूप से यह नृत्य चाँदनी रात में किया जाता था जब युवा एकत्र होते और सामूहिक रूप से नृत्य करते हुए सामाजिक मेलजोल बढ़ाते।

थाबल चोंगबा की तकनीक और सामुदायिक भूमिका

ढांचा और प्रदर्शन
  • थाबल चोंगबा में शामिल लोग, पुरुष और महिलाएँ एक बड़ी या कई छोटी-छोटी परिक्रमाएँ बनाकर हाथ पकड़ कर खड़े होते हैं। संगीत ताल पर कदमों और हाव-भावों का समन्वय रखते हुए समूह निश्चित पैटर्न में घूमता है। गाने सामान्यतः लोक-गीतों पर आधारित होते हैं और वाद्य साधनों में ढोल, बाँसुरी और थप्पड़/तश्तरी जैसे परम्परागत वाद्य शामिल होते हैं।
सामाजिक और युवा-मिलन का महत्व
  • थाबल चोंगबा का एक बड़ा सामाजिक महत्व यह है कि यह युवाओं के बीच मेलजोल, बातचीत और सामुदायिक जुड़ाव का माध्यम बनता है। ऐतिहासिक रूप में कई स्थानों पर पारंपरिक व्यवस्था में परिवारों द्वारा लड़कियों को बाहर थोड़ी स्वतंत्रता देने में यह नृत्य एक विशेष अवसर माना जाता था। यानि यह नृत्य सामाजिक बाधाओं के बीच भी कुछ हद तक युवा मिलने-जुलने का खुला मंच रहा है।
वेशभूषा और प्रस्तुति
  • थाबल चोंगबा के लिए पहनावा अपेक्षाकृत सरल और पारंपरिक होता है। महिलाएँ पारंपरिक सिल्क साड़ी या लोक परिधान पहनती हैं। पुरुष पारंपरिक कुर्ता-पायजामा या स्थानीय वस्त्र। रंगोली और स्थानीय गहनों का उपयोग भी सामूहिक आयोजन में देखा जा सकता है। रात के आयोजन में रोशनी, रंग-बिरंगी लाईट्स और मंच-सज्जा से माहौल खूबसूरत बनता है।

जगोई बनाम थाबल चोंगबा तुलनात्मक अवलोकन

  • प्रकृति: जगोई अधिक शास्त्रीय/धार्मिक और रचनात्मक प्रस्तुति-आधारित है; थाबल चोंगबा लोक और सामुदायिक नृत्य है।
  • परिणाम: जगोई में व्यक्तिपरक अभिनव प्रदर्शन और नाटकीयता हो सकती है; थाबल चोंगबा समूह और सामुदायिक सहभागिता पर केंद्रित है।
  • समय/संदर्भ: जगोई किसी धार्मिक कार्यक्रम, मंच या नाट्य प्रस्तुति में होता है; थाबल चोंगबा विशेषकर याओशांग और चाँदनी रात के मेलों में देखा जाता है।
  • टेक्नीक्स: जगोई की मुद्राएँ सूक्ष्म और नियंत्रित होती हैं; थाबल चोंगबा में चालों का समन्वय और सामूहिक लय महत्वपूर्ण है।

आधुनिक काल में संरक्षण और चुनौतियाँ

वैश्वीकरण और बदलती प्राथमिकताएँ
  • विश्व परिवेश के बदलने, आधुनिक मनोरंजन के प्रचलन और युवा वर्ग के रुचियों में परिवर्तन के कारण पारंपरिक नृत्य रूपों को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। थाबल चोंगबा और जगोई दोनों परंपरागत रूप अपने वास्तविक रूप में बने रहने के लिए प्रयासरत हैं। आधुनिक मंचों पर प्रस्तुति के लिए डांस-फ्यूज़न, रीयलिटी-शो और शहरी प्रदर्शनकारियों द्वारा नृत्यों का रूपांतरण देखने को मिलता है। यह सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के परिणाम ला सकता है। एक ओर परंपरा का प्रचार-प्रसार बढ़ा, दूसरी ओर मूल विशिष्टता कम होने का डर भी बना।
संरक्षण के प्रयास
  • मणिपुर और सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों द्वारा पारंपरिक नृत्यों को संरक्षित करने के अनेक प्रयास हो रहे हैं। नृत्य विद्यालय, सांस्कृतिक महोत्सव, और युवा प्रशिक्षण शिविर इनमें प्रमुख हैं। साथ ही राष्ट्रीय-स्तरीय मंचों और अंतर्राष्ट्रीय प्रस्तुतियों ने मणिपुरी नृत्यों को वैश्विक दर्शकों तक पहुँचाया है जिससे जागरूकता और गर्व का भाव बढ़ा है।
दस्तावेज़ीकरण और शिक्षा
  • आज का एक महत्वपूर्ण कदम है इन नृत्यों का शैक्षिक और ऑडियो-विजुअल दस्तावेज़ीकरण। पारंपरिक गीतों, कदमों और स्थानीय कहानियों को रिकॉर्ड करना भावी पीढ़ियों के लिए अवश्यम्भावी है। लोक कलाकारों और गुरु-शिक्षकों का सम्मान और आर्थिक समर्थन भी संरक्षण का अहम हिस्सा है।
त्योहारों और सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुति
  • याओशांग के समय थाबल चोंगबा बड़े पैमाने पर आयोजित होता है। गाँव, शहर और छात्र-समूहों द्वारा सार्वजनिक आयोजन किए जाते हैं। जगोई की शास्त्रीय/रासलीला प्रस्तुति मंदिरों, कला महोत्सवों और नृत्य महाविद्यालयों में प्रमुखता से होती है। राष्ट्रीय नाट्य और सांस्कृतिक मंचों पर मणिपुरी नृत्य की प्रस्तुतियाँ देश-विदेश में प्रशंसित होती हैं जिससे परंपरा को नई पीढ़ी के कलाकारों तक पहुँचने का मार्ग मिलता है।

प्रसिद्ध कलाकार और नृत्य संस्थाएँ

मणिपुरी नृत्य की विरासत में कई गुरु, कलाकार और संस्थाएँ शामिल हैं जिन्होंने जगोई और अन्य मणिपुरी रूपों को जीवित रखा। इन कलाकारों और शिक्षण संस्थाओं ने शोध, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन के माध्यम से मणिपुरी नृत्य को विस्तृत पहचान दिलाई। इस परंपरा को शास्त्रीय रूप देने और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाने में महान गुरु गुरु बिपिन सिंह का योगदान ऐतिहासिक है। उन्होंने मणिपुरी नृत्य की तकनीक, सौंदर्यबोध और शिक्षण-पद्धति को सुव्यवस्थित कर नई पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाया। उनके साथ-साथ अनेक लोक-कलाकारों और मंदिर-परंपराओं से जुड़े गुरुओं ने भी इस कला को जीवित रखा।

संस्थागत स्तर पर जवाहरलाल नेहरू मणिपुर डांस अकादमी जैसी संस्थाओं ने प्रशिक्षण, शोध और मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से मणिपुरी नृत्य को संरक्षित और संवर्धित किया। अकादमी ने परंपरा और आधुनिकता के संतुलन के साथ कलाकारों को तैयार किया जिससे रासलीला, जगोई और अन्य रूपों की शुद्धता बनी रही।

थाबल चोंगबा का आधुनिक रूप और युवाओं की भागीदारी

युवा वर्ग थाबल चोंगबा को उत्साहपूर्वक अपनाता है। यह पारंपरिक मेलजोल और आधुनिक सामाजिक मेल-मिलाप का मिश्रण है। कुछ जगहों पर थाबल चोंगबा में आधुनिक संगीत, लाइटिंग और स्टेज-सेटअप का सम्मिलन देखने को मिलता है जिससे यह न सिर्फ स्थानीय बल्कि पर्यटक-अनुकूल भी बन रहा है। फिर भी, कई समुदाय परंपरागत प्रारूप को बनाए रखने के पक्ष में हैं ताकि नृत्य की आत्मीयता और सामाजिक मूल्यों को संरक्षित रखा जा सके।

नृत्य के पर्यटक और आर्थिक आयाम

मणिपुर का सांस्कृतिक पर्यटन इन नृत्य-रूपों के कारण बढ़ रहा है। विशेषकर जगोई और थाबल चोंगबा जैसे आयोजन स्थानीय समुदायों को आर्थिक अवसर प्रदान करते हैं। हस्तशिल्प, परिधान, संगीत और मेहमाननवाज़ी के क्षेत्र में रोज़गार बनते हैं। सही प्रचार-प्रसार और सतत आयोजन से ये पहल और सुदृढ़ हो सकती हैं।

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