झारखंड में सरहुल नृत्य का त्यौहार किस जनजाति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है?

झारखंड में सरहुल नृत्य का त्यौहार उरांव (Oraon) जनजाति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। सरहुल झारखंड और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख व पारंपरिक वसंत-उत्सव है। यह त्यौहार पृथ्वी, पेड़ों विशेषकर साल (Sal) वृक्ष और प्रकृति के प्रति आभार और पूजा की अभिव्यक्ति है। उरांव (Oraon) जनजाति के साथ-साथ कुड़ुख/कुरुख, हु (Ho), मुंडा, भूमिज और अन्य आदिवासी समूहों के बीच सरहुल की महत्ता बहुत गहरी है। यह न सिर्फ़ धार्मिक रिवाज़ों का संगम है बल्कि सामुदायिक पहचान, कृषि चक्र और पारिस्थितिकी संवेदनशीलता का भी प्रतिनिधित्व करता है।

झारखंड में सरहुल नृत्य का त्यौहार उरांव (Oraon) जनजाति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

सरहुल: नाम, अर्थ और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

“सरहुल” शब्द का व्युत्पत्ति निरूपण विभिन्न जनसमूहों में अलग-अलग बताया जाता है। नागपुरी भाषा में ‘सर’ अथवा ‘सराई’ साल (Shorea robusta — साल का वृक्ष) को संदर्भित करता है और ‘हुल’ का अर्थ ‘सामूहिकता/उत्सव’ या ‘प्रारम्भ/उठान’ माना जाता है। इस प्रकार सरहुल का शाब्दिक अर्थ है “साल-वृक्ष की पूजा/साल का सामूहिक उत्सव”। कुछ विद्वानों ने इसे वर्ष के आरम्भ और वसंत ऋतु के आगमन से जोड़कर भी व्याख्यायित किया है।

इतिहासिक रूप से सरहुल का जड़ें आदिवासी जीवन-शैली, वर्पण-आधारित अर्थव्यवस्था और वन-आश्रित संसाधनों से गहरे जुड़ी हैं। पारंपरिक समाज में पेड़-वन जीवन-निर्वाह का आधार रहते थे। इसलिए पेड़ और वर्षा का आगमन समुदाय के लिए जीविका और समृद्धि का संकेत माना गया। इसीलिए साल-वृक्ष और उसके पुष्पों का समर्पण व पूजा सरहुल के केन्द्र में रहता है।

त्यौहार कब और कहाँ मनाया जाता है?

सरहुल हर वर्ष चैत्र मास के पहले पक्ष (शुक्ल पक्ष) के तीसरे दिन से प्रारम्भ होकर चैत पूर्णिमा तक या आस-पास के दिनों में मनाया जाता है। यह वसंत के आगमन और कृषि-चक्र के आरम्भ का संकेत देता है। त्योहार मुख्यतः झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाता है। रांची, सरायकेला, कोडाउन, पलामू, गिरिडीह आदि जिलों में इसके आयोजन की विशिष्टता है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों और बिहार के आदिवासी इलाकों में भी सरहुल के समान पर्व मनाने के प्रमाण मिलते हैं।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व

सरहुल पारंपरिक रूप से प्रकृति-उन्मुख पूजा का प्रतीक है। साल-वृक्ष को आत्मा/दैवी उपस्थिति का आवास माना जाता है और उसे जतन व सम्मान दिया जाता है। पूजा में गाँव के पुजारी जिसे पहान, लाया, देउरी या पुजार कहा जाता है मुख्य भूमिका निभाते हैं। पहान सामूहिक रूप से वंदना, बलि (पारंपरिक रूप से मुर्गी/लालती के रूप में) और तर्पण करते हैं तथा समुदाय के लिये समृद्धि व सुरक्षित वर्ष की कामना करते हैं। 

धार्मिक विधियों के अलावा सरहुल सामाजिक समरसता, मेल-जोल और युवाओं के मेल का समय होता है। त्योहार के दौरान ग्रामसभा, सामूहिक भोज और लोकगीत/नृत्य के माध्यम से नए जोड़ों का मिलन, समाजिक संदेश तथा सामुदायिक निर्णय भी होते हैं। यह संस्कृति का एक जीवंत उत्सव है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता आया है।

सरहुल नृत्य: स्वरूप, संगीत और भाव

सरहुल नृत्य धार्मिक अनुष्ठान का अभिन्न अंग है। यह नृत्य सामूहिक रूप से किया जाता है। महिलाएं पारंपरिक सफेद/लाल किनारी वाली साड़ी, गहने और पटल पहनकर रेखाबद्ध पंक्तियों में आती हैं। पुरुष पारंपरिक लुंगियाँ, आंगवस्त्र और कभी-कभी मुखौटे/सिरोपा पहनते हैं। नृत्य के दौरान मण्डल, ढोल, नगाड़ा, मृदंग या मादल जैसे पीरियडिक वाद्य चलाये जाते हैं। ताल और भजन-धुन के साथ लोकगीत गाए जाते हैं जो प्रकृति, साल के फूल और देवताओं की स्तुति करते हैं।

नृत्य-रूप सामूहिक होते हुए भी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की गुंजाइश रखते हैं। नर्तक, कभी-कभी मुखिया या पुरुष-नर्तक, अपेक्षित ताल पर नृत्य की अगुवाई करता है और बाकी समुदाय उसे दोहराता है। नृत्य की मुद्राएँ हाथों के संकेत, कदमों की ताल और श्रृंगारात्मक झुकाव सभी पारंपरिक अर्थ लिए होते हैं। 

उरांव (Oraon) जनजाति और उनका नृत्य-संस्करण

उरांव जो कि कुरुख भाषी है और जिन्हें अंग्रेज़ी में Oraon या Kurukh भी कहा जाता है सरहुल के मुख्य आयोजकों में से एक हैं। उरांव समुदाय में इस त्यौहार का स्थान विशेष है क्योंकि यह उनकी पारंपरिक धार्मिक प्रणाली (सरना धर्म/वन-पूजा) की आत्मा से जुड़ा है। उरांवों के सरहुल नृत्य में विशिष्टता उनके गीतों की भाषा (कुरुख/स्थानिक बोली), वेशभूषा की शैली और नृत्य-चालों में निहित प्रतीकों में दिखती है।

उदाहरणतः उरांव नाटकीयता और सामूहिकता पर विशेष जोर देते हैं। नृत्य कतारों में घूमता है, बीच-बीच में थिरकते हुए युवा जोड़े मंच पर आते हैं और सामूहिक गायन से पूरे उत्सव की ऊर्जा बनी रहती है। पुरुष वादक मादल, ढोल, नागड़ा बजाकर ताल बनाते हैं और महिलाएँ गीत गाकर नृत्य को धार देती हैं। यह संयोजन बहुत जीवंत और सामुदायिक भावना से परिपूर्ण होता है।

वेशभूषा और सजावट

सरहुल के नृत्य-वेशभूषा में पारंपरिक साड़ियों (सफेद या क्रीम बेस पर लाल बॉर्डर अक्सर दिखता है)। धनुष-सी पगड़ी, कड़े,नेकलेस और कमरबंध प्रमुख होते हैं। महिलाएँ अपने बालों में साल के पत्तों और फूलों से श्रृंगार करती हैं। पुरुषों के सिर पर कभी-कभी रंगीन टोपी या परंपरागत टुप्पी होती है। रंगों का संयोजन लाल, सफेद और प्राकृतिक हरे-भूरे रंग वसंत और साल के फूलों के मेल को प्रतिबिंबित करता है।

रस्में और आचार-विचार

सरहुल के आरंभ में एक विशेष पूजन स्थली (सर्णा/सरना स्थान) पर पहान द्वारा अनुष्ठान संपन्न होता है। इसके दौरान स्वच्छ जल, साल-पुष्प, फल और कभी-कभी शराब (हंडिया/टापन) अर्पित की जाती है। पारंपरिक रीति में तीन मुर्गियाँ चढ़ाने का प्रचलन भी वर्णित है। प्रत्येक को सूर्य, स्थानीय देवता और पूर्वजों के प्रति समर्पित किया जाता है। अनुष्ठान के बाद समुदाय मिलकर नृत्य और भजन करते हैं और सामूहिक भोज होता है।

एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि परंपरागत कृषि काम जैसे जुताई त्योहार के दिन निषिद्ध होता है। यह दिन शांति, पुनरुत्थान और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का दिन माना जाता है।

संगीत का महत्व और लोकगीत

सरहुल के गीतों में प्रकृति-आधारित अलंकारिक भाषा मिली रहती है। साल-पुष्प, बादल, वर्षा, धान के खेत और पूर्वजो की महिमा बार-बार सामने आती है। संगीत वादन में मादल, ढोल और नगाड़े की समृद्ध तालें प्रमुख हैं। गीतों का स्वर सामूहिक और स्तुति-प्रधान होता है जिसे सुनकर समुदाय में आत्मीयता और ऊर्जा का संचार होता है। संगीत न सिर्फ आनंद देता है बल्कि वह पारंपरिक ज्ञान, लोककथाओं और सामुदायिक इतिहास को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम भी होता है।

सामाजिक और पारिस्थितिक संदेश

सरहुल आज केवल एक लोक-त्योहार नहीं रह गया। यह एक पारिस्थितिक चेतना का प्रतीक भी बन गया है। आधुनिक समय के पर्यावरणीय संकट वन कटाई, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता ह्रास के संदर्भ में सरहुल का संदेश प्रासंगिकता और तीव्रता से उभरता है। अनेक आदिवासी और नगरीय समूह इस त्योहार का उपयोग प्रकृति संरक्षण, पेड़ारोपण और पर्यावरण शिक्षा का माध्यम बनाने लगे हैं। कुछ शहरी कार्यक्रम, सम्मान समारोह और सांस्कृतिक मेलों में भी सरहुल के तत्व शामिल किए जाते हैं ताकि अधिक जनसंख्या तक यह संदेश पहुँच सके।  

भाषाई-सांस्कृतिक विविधता: अलग-अलग नाम और रूप

सरहुल को विभिन्न जनजातियों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कुरुख समुदाय में इसे 'खद्दी' भी कहा जाता है। भूमिजों में 'हाड़ी बोंगा' और हु/मुंडा समुदायों में 'बा पारब' जैसे नाम मिलते हैं। नामों और रीतियों का यह विविधता दर्शाती है कि मूल विचार प्रकृति की पूजा और वसंत का स्वागत समान रहते हुए स्थानीय रीति-रिवाज़ कितने रंगीन तरीके से विकसित हुए हैं।

आधुनिकरण, राजनीतिक-प्रतीक और सार्वजनिक पहचान

बीते कुछ दशकों में सरहुल ने आदिवासी राजनीतिक चेतना और सार्वजनिक पहचान का भी रूप धारण किया है। सार्वजनिक कार्यक्रमों, राज्य स्तरीय समारोहों और पर्यटन प्रचार में सरहुल को झारखंड की सांस्कृतिक पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परन्तु इस सार्वजनिकरण के साथ कुछ चुनौतियाँ भी आईं। धार्मिक-स्थलों पर अधिक भीड़, वाणिज्यिकीकरण, और उसे शुद्ध लोक-आधार से अलग कर देने का खतरा। इसलिए सामुदायिक संगठनों द्वारा पारंपरिक रीति-रिवाज़ों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

राजनीतिक-प्रासंगिक मामलों में भी सरहुल विवादों या आंदोलनों का केन्द्र बनता रहा है। उदाहरण के लिए किसी सार्वजनिक निर्माण कार्य के कारण पारंपरिक सरना-स्थलों के पास पहुंच बाधित होने पर स्थानीय समुदायों का विरोध होता है क्योंकि वे इसे धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं। यह दर्शाता है कि सरहुल सिर्फ़ संस्कृति नहीं बल्कि सामुदायिक अधिकारों और पहचान का प्रतीक भी बन चुका है।

सरहुल का अभ्यास: बचाव और संवर्धन के उपाय

सरहुल जैसा पारंपरिक उत्सव समकालीन दबावों शहरीकरण, वनों की कटाई, युवाओं की परंपराओं से दूरी से गुजर रहा है। इसके संरक्षण के लिए कुछ व्यवहारिक कदम उपयोगी हैं:
शैक्षिक समावेशन: स्कूलों व कॉलेजों में लोक-परंपराओं व आदिवासी इतिहास को पाठ्यक्रम में शामिल करके युवा पीढ़ी में रुचि बढ़ाई जा सकती है।
  • समुदाय-आधारित दस्तावेज़ीकरण: गीत, नृत्य-चक्र, परंपरागत रीति-रिवाज़ रिकॉर्ड कर उन्हें डिजिटल/प्रिंट रूप में संरक्षित किया जा सकता है।
  • पारिस्थितिक पहल: सरहुल के मूल संदेश पेड़ और प्रकृति की रक्षा को ध्यान में रखते हुए वृक्षारोपण अभियानों को त्योहार से जोड़ना।
  • स्थानीय नेतृत्व को सशक्त करना: सरकारी व गैर-सरकारी योजनाओं में समुदायों को निर्णय-निर्धारण का अधिकार देकर पारंपरिक स्थलों का संरक्षण सुनिश्चित करना।
  • संस्कृति पर्यटन का संवेदनशील उपयोग: सांस्कृतिक पर्यटन को इस तरह विकसित किया जाना चाहिए कि वह स्थानीय जीवन-शैली और धार्मिक-स्थलों के सम्मान के साथ हो न कि केवल प्रदर्शन या व्यावसायीकरण के रूप में।

सरहुल और समकालीन कला-संस्कृति

समकालीन साहित्य, फ़िल्में और मंचीय प्रस्तुतियाँ भी सरहुल से प्रेरित विषयों को अपना रही हैं। युवा कलाकार सरहुल के गीतों को नए संगीत आयाम देकर, नृत्य को मंचीय-नाटकीयता में ढालकर और दस्तावेज़ी फिल्मांकन द्वारा इसे व्यापक दर्शकों तक पहुंचा रहे हैं। यह पारंपरिक और आधुनिक की स्पष्ट लेकिन संवेदनशील मेल को दर्शाता है बशर्ते पारंपरिक मूल्यों का सम्मान बना रहे।

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