नट पारंपरिक गायन शैली है जो किस नृत्य से संबंधित है?

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‘नट’ पारंपरिक गायन शैली है जो मणिपुरी नृत्य से संबंधित है। मणिपुर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा में मणिपुरी नृत्य का विशेष स्थान है। इस नृत्य परंपरा की आत्मा केवल शारीरिक गतियों में ही नहीं बल्कि उससे जुड़े संगीत और गायन में भी बसती है। इन्हीं संगीत परंपराओं में ‘नट’ एक महत्वपूर्ण पारंपरिक गायन शैली है जो मणिपुरी नृत्य से घनिष्ठ रूप से संबंधित है।

‘नट’ पारंपरिक गायन शैली है जो मणिपुरी नृत्य से संबंधित है।

‘नट’ गायन शैली की पृष्ठभूमि

‘नट’ शैली मणिपुरी समाज की वैष्णव भक्ति परंपरा से विकसित मानी जाती है। यह गायन शैली धार्मिक अनुष्ठानों, मंदिर उत्सवों और नृत्य प्रस्तुतियों के दौरान प्रयुक्त होती है। ‘नट’ का उद्देश्य केवल संगीत प्रस्तुति नहीं बल्कि नृत्य के भाव, कथा और रस को स्पष्ट रूप से प्रकट करना होता है।

मणिपुरी नृत्य में ‘नट’ की भूमिका

मणिपुरी नृत्य अत्यंत कोमल, लयात्मक और आध्यात्मिक प्रकृति का होता है। ‘नट’ गायन शैली नृत्य की ताल, गति और भाव को दिशा देती है। नर्तक ‘नट’ के स्वर, शब्द और लय के अनुसार अपने पद संचालन, हस्त मुद्राएँ और भावाभिनय प्रस्तुत करता है। इस प्रकार गायन और नृत्य के बीच एक जीवंत संवाद स्थापित होता है।

संगीतात्मक विशेषताएँ

‘नट’ गायन में मधुर, संयमित और भक्तिपूर्ण स्वर प्रमुख होते हैं। इसमें गीतों के बोल प्रायः धार्मिक कथाओं, विशेषकर कृष्ण भक्ति और वैष्णव दर्शन से जुड़े होते हैं। गायन के साथ पारंपरिक मणिपुरी वाद्य जैसे पुंग (ढोल), करताल और मंजीरा का प्रयोग किया जाता है जो नृत्य को लयात्मक आधार प्रदान करते हैं।

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

‘नट’ गायन शैली मणिपुरी संस्कृति में केवल एक कला रूप नहीं बल्कि आस्था और परंपरा का माध्यम है। यह शैली गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। धार्मिक अनुष्ठानों में ‘नट’ का गायन वातावरण को आध्यात्मिक बना देता है और नृत्य को गहन भावनात्मक अर्थ प्रदान करता है।

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