सरायकेला छऊ किस भारतीय राज्य का लोकप्रिय नृत्य है?

सरायकेला छऊ झारखंड का लोकप्रिय नृत्य है। भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक अद्भुत उदाहरण उसके लोक और शास्त्रीय नृत्य हैं। हर राज्य, हर क्षेत्र अपनी विशिष्ट नृत्य परंपराओं के माध्यम से अपनी पहचान बनाता है। झारखंड का सरायकेला छऊ नृत्य ऐसी ही एक अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है जो न केवल झारखंड बल्कि पूरे भारत और विश्व में अपनी विशिष्ट शैली, मुखौटों, भाव-भंगिमाओं और कथानक-प्रधान प्रस्तुति के लिए प्रसिद्ध है। यह नृत्य वीरता, भक्ति, सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

सरायकेला छऊ झारखंड का लोकप्रिय नृत्य है।

सरायकेला छऊ, छऊ नृत्य की तीन प्रमुख शैलियों सरायकेला, पुरुलिया और मयूरभंज में से एक है। इन तीनों में सरायकेला छऊ अपनी कोमलता, लयात्मकता और सूक्ष्म भावाभिनय के कारण अलग पहचान रखता है। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक चेतना का सशक्त माध्यम भी है।

छऊ नृत्य की अवधारणा और उत्पत्ति

‘छऊ’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ इसे संस्कृत शब्द ‘छाया’ (अर्थात् छवि या मुखौटा) से जोड़ते हैं तो कुछ इसे सैनिक अभ्यास और युद्ध-कला से उत्पन्न मानते हैं। छऊ नृत्य की उत्पत्ति पूर्वी भारत के आदिवासी और ग्रामीण समाज में हुई जहाँ नृत्य जीवन का अभिन्न अंग था।

छऊ नृत्य में युद्ध-कौशल, शिकार, पशु-पक्षियों की गतियाँ, देव-दानव कथाएँ और लोकजीवन के दृश्य सम्मिलित होते हैं। समय के साथ यह नृत्य अधिक संगठित, कथानक-प्रधान और सौंदर्यपरक बनता गया।

सरायकेला छऊ का ऐतिहासिक विकास

सरायकेला छऊ का विकास सरायकेला रियासत में हुआ। यहाँ के राजाओं और जमींदारों ने इस नृत्य को संरक्षण दिया और इसे राजदरबार से लेकर जनसामान्य तक पहुँचाया। विशेष रूप से 18वीं और 19वीं शताब्दी में सरायकेला छऊ ने एक सुसंगठित नृत्य-शैली का रूप लिया।

सरायकेला के शासकों ने न केवल इस नृत्य को संरक्षण दिया बल्कि स्वयं भी इसके अभ्यास और प्रस्तुति में रुचि ली। इससे यह नृत्य अधिक परिष्कृत और कलात्मक बन सका। यहीं से सरायकेला छऊ की पहचान एक शास्त्रीय-लोक नृत्य के रूप में स्थापित हुई।

सरायकेला छऊ की विशिष्टताएँ

मुखौटों का प्रयोग
  • सरायकेला छऊ की सबसे बड़ी विशेषता इसके कलात्मक मुखौटे हैं। ये मुखौटे मिट्टी, कागज, लकड़ी और रंगों से बनाए जाते हैं। हर मुखौटा किसी पात्र की पहचान, स्वभाव और भावनात्मक स्थिति को दर्शाता है जैसे राम, कृष्ण, अर्जुन, रावण, महिषासुर या पशु-पक्षी।
कोमल और लयात्मक गति
  • अन्य छऊ शैलियों की तुलना में सरायकेला छऊ में शारीरिक बल की अपेक्षा लय, संतुलन और कोमलता अधिक होती है। हाथों, पैरों और धड़ की गतियाँ अत्यंत सधी हुई और सौंदर्यपूर्ण होती हैं।
सूक्ष्म भावाभिनय
  • मुखौटा पहनने के बावजूद कलाकार अपने शरीर की गति, मुद्रा और लय के माध्यम से भावों को व्यक्त करता है। यही कारण है कि सरायकेला छऊ को “मूक नाट्य” भी कहा जाता है।

कथानक और विषयवस्तु

सरायकेला छऊ के नृत्य-नाट्य मुख्यतः भारतीय पौराणिक ग्रंथों और लोककथाओं पर आधारित होते हैं जैसे:
  • रामायण
  • महाभारत
  • पुराण कथाएँ
  • शिव-पार्वती, दुर्गा-महिषासुर, कृष्ण-लीला
  • लोकजीवन और प्रकृति से जुड़े प्रसंग
इन कथाओं के माध्यम से नृत्य नैतिक मूल्यों, वीरता, भक्ति और मानवीय संघर्षों को प्रस्तुत करता है।

संगीत और वाद्ययंत्र

सरायकेला छऊ में संगीत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ढोल, नगाड़ा, शहनाई, बाँसुरी और झांझ जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है। संगीत की लय नर्तकों की गति और भावाभिव्यक्ति को दिशा देती है। नृत्य प्रायः बिना संवाद के होता है। इसलिए संगीत और ताल ही कथा को आगे बढ़ाते हैं।

वेशभूषा और आभूषण

सरायकेला छऊ की वेशभूषा रंगीन, आकर्षक और पात्रानुकूल होती है। राजसी पात्रों के लिए भव्य परिधान, देवताओं के लिए शांत और उज्ज्वल रंग जबकि राक्षस पात्रों के लिए उग्र रंगों का प्रयोग किया जाता है। आभूषण, मुकुट और मुखौटे मिलकर मंच पर एक जीवंत दृश्य रचते हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

सरायकेला छऊ झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी समाज में केवल कला नहीं बल्कि सामूहिक चेतना का प्रतीक है। यह नृत्य:
  • सामाजिक एकता को मजबूत करता है
  • पीढ़ी-दर-पीढ़ी सांस्कृतिक ज्ञान का हस्तांतरण करता है
  • युवाओं को अनुशासन, शारीरिक संतुलन और सौंदर्यबोध सिखाता है
त्योहारों, मेलों और धार्मिक आयोजनों में यह नृत्य विशेष रूप से प्रस्तुत किया जाता है।

त्योहार और मंच

सरायकेला छऊ का प्रमुख आयोजन चैत्र पर्व के समय होता है। इसके अलावा राज्य और राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक महोत्सवों में भी इसकी प्रस्तुति दी जाती है। आज यह नृत्य अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँच चुका है और झारखंड की सांस्कृतिक पहचान बन गया है।

संस्थाएँ और संरक्षण

सरायकेला छऊ के संरक्षण और प्रशिक्षण के लिए कई संस्थाएँ कार्यरत हैं। इनमें सबसे प्रमुख है:
  • सरायकेला छऊ नृत्य विद्यालय
इन संस्थानों के माध्यम से युवा कलाकारों को प्रशिक्षण दिया जाता है और इस परंपरा को जीवित रखा जाता है।

यूनेस्को द्वारा मान्यता

छऊ नृत्य को यूनेस्को द्वारा मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया गया है। यह मान्यता सरायकेला छऊ सहित सभी छऊ शैलियों के लिए गर्व का विषय है और इसके वैश्विक महत्व को दर्शाती है।

आधुनिक युग में सरायकेला छऊ

आज सरायकेला छऊ आधुनिक मंचों, नृत्य-उत्सवों और शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाया और प्रस्तुत किया जा रहा है। हालांकि आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के कारण चुनौतियाँ भी हैं। फिर भी कलाकार और संस्थाएँ इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।

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