एच.टी.एल.वी.-II नामक वायरस से कौन सा रोग फैलता है?

एच.टी.एल.वी.-II नामक वायरस से एड्स (Aids) रोग फैलता है। एड्स (AIDS – Acquired Immuno Deficiency Syndrome) आधुनिक युग की सबसे गंभीर और चर्चित संक्रामक बीमारियों में से एक है। यह रोग मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को धीरे-धीरे कमजोर कर देता है जिससे साधारण संक्रमण भी घातक रूप ले सकता है। प्रारंभिक वैज्ञानिक अध्ययनों के दौरान इस रोग से जुड़े वायरसों को अलग-अलग नाम दिए गए जिनमें एच.टी.एल.वी. (Human T-Lymphotropic Virus) समूह का उल्लेख प्रमुख रहा।

एच.टी.एल.वी.-II नामक वायरस से एड्स (Aids) रोग फैलता है।

एड्स (AIDS) रोग की संकल्पना

एड्स कोई एकल रोग नहीं बल्कि एक सिंड्रोम है जिसमें अनेक प्रकार के अवसरवादी संक्रमण (Opportunistic Infections) और कैंसर उत्पन्न हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण ऐसा वायरस होता है जो मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट कर देता है। मानव प्रतिरक्षा प्रणाली का प्रमुख घटक टी-लिम्फोसाइट (विशेषकर CD4 कोशिकाएँ) होती हैं। जब इन कोशिकाओं की संख्या अत्यधिक घट जाती है तब शरीर संक्रमणों से लड़ने में असमर्थ हो जाता है और व्यक्ति एड्स की अवस्था में पहुँच जाता है।

एच.टी.एल.वी. (HTLV) वायरस समूह

एच.टी.एल.वी. वायरस रेट्रोवायरस (Retrovirus) वर्ग के अंतर्गत आते हैं। रेट्रोवायरस की विशेषता यह होती है कि वे अपने आनुवंशिक पदार्थ (RNA) को DNA में परिवर्तित कर मेजबान कोशिका के जीनोम में समाहित कर लेते हैं।

एच.टी.एल.वी. समूह में मुख्यतः निम्न प्रकार पाए जाते हैं:
  • एच.टी.एल.वी.-I
  • एच.टी.एल.वी.-II
इन वायरसों का प्राथमिक लक्ष्य टी-लिम्फोसाइट कोशिकाएँ होती हैं। प्रारंभिक शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने इन्हीं वायरसों को एड्स से जोड़कर देखा क्योंकि इनमें टी-कोशिकाओं को प्रभावित करने की क्षमता थी।

एच.टी.एल.वी.-II का परिचय

एच.टी.एल.वी.-II एक मानव टी-लिम्फोट्रॉपिक वायरस है जो मुख्यतः टी-कोशिकाओं को संक्रमित करता है। यह वायरस संरचनात्मक रूप से अन्य रेट्रोवायरसों जैसा होता है और इसमें निम्न घटक पाए जाते हैं:
  • RNA आनुवंशिक पदार्थ
  • रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एंजाइम
  • कैप्सिड एवं लिपिड आवरण
वैज्ञानिक इतिहास में एक समय ऐसा भी रहा जब एड्स के कारक वायरस को HTLV-III या इससे मिलते-जुलते नामों से पहचाना गया। बाद में विस्तृत अनुसंधान के बाद एड्स के वास्तविक कारक वायरस को HIV (Human Immunodeficiency Virus) नाम दिया गया।

एच.टी.एल.वी.-II और एड्स : ऐतिहासिक दृष्टिकोण

1980 के दशक की शुरुआत में जब एड्स पहली बार पहचाना गया तब वैज्ञानिकों के पास सीमित जानकारी थी। उस समय टी-लिम्फोसाइट को प्रभावित करने वाले वायरसों की खोज हो रही थी।
  • प्रारंभिक शोधों में HTLV समूह के वायरसों को एड्स का संभावित कारण माना गया।
  • कुछ वैज्ञानिक लेखों में HTLV-II का भी उल्लेख हुआ।
  • आगे चलकर यह स्पष्ट हुआ कि एड्स का मुख्य कारण HIV है किंतु HTLV शब्दावली ऐतिहासिक रूप से इस रोग से जुड़ी रही।

वायरस द्वारा संक्रमण की प्रक्रिया

एच.टी.एल.वी.-II जैसे रेट्रोवायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद निम्न चरणों से गुजरते हैं:
  • प्रवेश (Entry) – वायरस रक्त या अन्य शारीरिक द्रवों के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है।
  • संलग्नन (Attachment) – वायरस टी-लिम्फोसाइट की सतह से जुड़ता है।
  • रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन – वायरस का RNA, DNA में परिवर्तित हो जाता है।
  • एकीकरण (Integration) – यह DNA मेजबान कोशिका के जीनोम में जुड़ जाता है।
  • प्रतिकृति (Replication) – संक्रमित कोशिका नए वायरस कण बनाने लगती है।
  • कोशिका विनाश – धीरे-धीरे टी-कोशिकाएँ नष्ट होती जाती हैं।
इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ती है।

एड्स रोग के लक्षण

एड्स के लक्षण संक्रमण के चरणों के अनुसार बदलते रहते हैं।

प्रारंभिक लक्षण
  • बुखार
  • थकान
  • गले में खराश
  • सूजी हुई लसीका ग्रंथियाँ
मध्य अवस्था
  • लगातार वजन घटना
  • बार-बार संक्रमण
  • त्वचा पर चकत्ते
  • रात में अत्यधिक पसीना
अंतिम अवस्था (एड्स)
  • तपेदिक (टीबी)
  • निमोनिया
  • फंगल संक्रमण
  • कुछ प्रकार के कैंसर

एड्स का निदान

एड्स का निदान मुख्यतः रक्त परीक्षणों द्वारा किया जाता है।
  • एंटीबॉडी परीक्षण
  • एंटीजन परीक्षण
  • CD4 कोशिकाओं की गणना
इन परीक्षणों से यह पता लगाया जाता है कि प्रतिरक्षा प्रणाली किस स्तर तक प्रभावित हो चुकी है।

उपचार एवं प्रबंधन

एड्स का पूर्ण उपचार अभी उपलब्ध नहीं है किंतु एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी (ART) द्वारा रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • ART वायरस की प्रतिकृति को रोकती है।
  • इससे रोगी का जीवनकाल बढ़ता है।
  • रोगी सामान्य जीवन जी सकता है।
नियमित दवाएँ, संतुलित आहार और चिकित्सकीय परामर्श इस रोग के प्रबंधन में अत्यंत सहायक हैं।

रोकथाम के उपाय

एड्स जैसे घातक रोग से बचाव के लिए निम्न उपाय आवश्यक हैं:
  • सुरक्षित यौन व्यवहार
  • संक्रमित सुइयों का प्रयोग न करना
  • रक्त की जाँच के बाद ही आधान
  • जन-जागरूकता और शिक्षा

सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक पहलू

एड्स केवल शारीरिक रोग नहीं बल्कि सामाजिक और मानसिक चुनौती भी है।
  • रोगियों के प्रति भेदभाव
  • सामाजिक बहिष्कार
  • मानसिक तनाव
इन समस्याओं के समाधान के लिए समाज में जागरूकता, सहानुभूति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यक है।

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