वह नृत्य कौन सा है जिसमे नर्तक विपरीत दिशाओं में संकेंद्रित वृत्तों के साथ वामावर्त वृत्त बनाते हैं?

वह नृत्य कौन सा है जिसमे नर्तक विपरीत दिशाओं में संकेंद्रित वृत्तों के साथ वामावर्त वृत्त बनाते हैं?
गरबा नृत्य में नर्तक विपरीत दिशाओं में संकेंद्रित वृत्तों के साथ वामावर्त वृत्त बनाते हैं। भारतीय लोकनृत्य परंपरा में गरबा केवल एक नृत्य नहीं बल्कि सामूहिक चेतना, आध्यात्मिक भाव और सामाजिक समरसता का उत्सव है। यह नृत्य विशेष रूप से गुजरात की सांस्कृतिक पहचान का केंद्र रहा है। गरबा की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक है नर्तकों द्वारा विपरीत दिशाओं में संकेंद्रित वृत्तों का निर्माण तथा वामावर्त (counter-clockwise) गति। यह भौतिक गति मात्र नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय चक्र, शक्ति-उपासना और सामूहिक लय का प्रतीकात्मक निरूपण है। प्रस्तुत लेख में गरबा के इसी ज्यामितीय, दार्शनिक, सांस्कृतिक और सौंदर्यात्मक पक्ष का विस्तृत विवेचन किया गया है। गरबा का अर्थ और उत्पत्ति ‘गरबा’ शब्द संस्कृत के ‘गर्भ’ से जुड़ा माना जाता है जिसका अर्थ है जीवन का मूल, सृजन का केंद्र। पारंपरिक रूप से गरबा दीप (गरबो) के चारों ओर नृत्य किया जाता है। यह दीप शक्ति के गर्भ, ऊर्जा के स्रोत और जीवन-चक्र का प्रतीक है। जैसे दीप के चारों ओर वृत्त बनता है वैसे ही नर्तक जीवन-चक्र की परिक्रमा करते हुए सामूहिक लय में आगे बढ़ते हैं। इतिहासकार…