ओडिसी शास्त्रीय नृत्य : परिचय
ओडिसी भारत की आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है। इसकी पहचान मंदिरों की मूर्तिकला में अंकित नृत्य-भंगिमाओं, ओडिशा संगीत की मधुरता और संस्कृत–ओड़िया काव्य पर आधारित अभिव्यक्ति से होती है।
ओडिसी नृत्य में नृत्य, नाट्य और संगीत का समन्वय अत्यंत सूक्ष्म रूप में देखने को मिलता है। यह केवल दर्शनीय कला नहीं बल्कि अनुभवजन्य साधना है जहाँ नर्तक अपने शरीर, मन और आत्मा को एक लय में बांधता है।
ओडिसी नृत्य की प्रस्तुति-रचना
ओडिसी नृत्य की प्रस्तुति सामान्यतः निम्नलिखित क्रम में होती है:
- मंगलाचरण
- बट्टू नृत्य
- पल्लवी
- अभिनय (अभिनयात्मक नृत्य)
- मोक्ष या समाप्ति नृत्य
इस संपूर्ण संरचना में मोक्ष अथवा अंतिम भाग का विशेष महत्व है। यही वह क्षण है जहाँ नृत्य अपने चरम पर पहुँचकर आध्यात्मिक शांति और पूर्णता का अनुभव कराता है। इस अंतिम चरण में पखावज अक्षरों की निर्णायक भूमिका होती है।
पखावज : परिचय
पखावज भारतीय तालवाद्यों में एक प्रमुख वाद्य है जिसका उपयोग विशेष रूप से ध्रुपद संगीत, ओडिसी और कथक नृत्य में किया जाता है। ओडिसी परंपरा में इसे प्रायः मर्दल कहा जाता है जो स्थानीय रूपांतरण है।
पखावज से उत्पन्न होने वाले बोल या अक्षर जैसे
- ता, धा, किट, तक, गदि, तिट, धिन, किटतक न केवल ताल को स्पष्ट करते हैं बल्कि नृत्य की गति, ऊर्जा और चरम को भी परिभाषित करते हैं।
पखावज अक्षर क्या हैं?
पखावज अक्षर वे ध्वन्यात्मक शब्द हैं जो पखावज वाद्य को बजाते समय उत्पन्न ध्वनियों को मौखिक रूप में व्यक्त करते हैं। ये अक्षर:
- ताल की संरचना बताते हैं
- लय को स्पष्ट करते हैं
- नर्तक को गति और विराम का संकेत देते हैं
- दर्शकों के लिए श्रवण सौंदर्य रचते हैं
भारतीय शास्त्रीय परंपरा में बोल केवल तकनीकी संकेत नहीं बल्कि एक सौंदर्यात्मक भाषा हैं।
ओडिसी में पखावज अक्षरों की भूमिका
ओडिसी नृत्य में पखावज अक्षर तीन स्तरों पर कार्य करते हैं:
- तालात्मक स्तर – नृत्य की गति और समयबद्धता को नियंत्रित करना
- शारीरिक स्तर – पद संचालन, चक्र, उछाल और स्थिरता को दिशा देना
- आध्यात्मिक स्तर – नृत्य को साधना की अनुभूति तक ले जाना
विशेष रूप से अंतिम चरण में जब नृत्य अपने उत्कर्ष की ओर बढ़ता है तो पखावज अक्षर नृत्य को एक निर्णायक समापन प्रदान करते हैं।
ओडिसी नृत्य का समापन और पखावज अक्षर
ताल का पूर्ण चक्र
- ओडिसी नृत्य के अंत में ताल का एक पूर्ण चक्र पूरा किया जाता है। पखावज अक्षर इस पूर्णता का संकेत देते हैं। जैसे ही अंतिम बोल गूंजते हैं नर्तक अंतिम मुद्रा में स्थिर हो जाता है।
ऊर्जा का उत्कर्ष
- पूरी प्रस्तुति में संचित ऊर्जा अंत में तीव्र और सघन रूप में प्रकट होती है। पखावज के तीव्र, स्पष्ट और शक्तिशाली अक्षर इस ऊर्जा को नियंत्रित दिशा देते हैं।
नृत्य और संगीत का एकत्व
- समापन के क्षण में नृत्य और संगीत अलग-अलग नहीं रहते। पखावज अक्षर नर्तक के पदाघात, देह-भंगिमा और दृष्टि से पूर्ण सामंजस्य स्थापित करते हैं।
आध्यात्मिक समापन और पखावज
ओडिसी नृत्य का अंतिम भाग मोक्ष कहलाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है बंधन से मुक्ति। इस खंड में:
अभिनय न्यूनतम होता है
- शुद्ध नृत्य (नृत्त) प्रधान होता है
- ताल और लय प्रमुख भूमिका निभाते हैं
पखावज अक्षरों के साथ प्रस्तुत यह नृत्य आत्मा की मुक्ति, शांति और पूर्णता का प्रतीक बन जाता है।
पखावज अक्षरों और शारीरिक भंगिमाओं का संबंध
जब पखावज का अंतिम बोल बजता है:
- पैरों का अंतिम ठहराव होता है
- त्रिभंगी या चौक मुद्रा स्थिर हो जाती है
- नेत्र, हस्त और मुखाभिनय एक बिंदु पर केंद्रित हो जाते हैं
यह स्थिरता केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक भी होती है।
सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टि से महत्व
भारतीय नाट्यशास्त्र में रस निष्पत्ति का सिद्धांत प्रमुख है। ओडिसी नृत्य के अंत में पखावज अक्षर:
- दर्शक को रस की पूर्ण अनुभूति कराते हैं
- नृत्य में किसी अधूरेपन की भावना नहीं रहने देते
- समापन को स्मरणीय बनाते हैं
इस प्रकार पखावज अक्षर सौंदर्यात्मक पूर्णता के वाहक हैं।
गुरु-शिष्य परंपरा में पखावज अक्षरों का प्रशिक्षण
ओडिसी की गुरु-शिष्य परंपरा में पखावज अक्षरों का अभ्यास विशेष महत्व रखता है। शिष्यों को:
- पहले बोल कंठस्थ कराए जाते हैं
- फिर उन्हीं बोलों पर पद संचालन सिखाया जाता है
- अंततः समापन के बोलों पर विशेष नियंत्रण विकसित कराया जाता है
यह प्रशिक्षण नृत्य को अनुशासन और गरिमा प्रदान करता है।
आधुनिक मंचीय प्रस्तुतियों में प्रासंगिकता
आज के समय में चाहे मंच बड़ा हो या छोटा, पारंपरिक हो या आधुनिक, ओडिसी नृत्य का समापन पखावज अक्षरों के बिना अधूरा माना जाता है। यह परंपरा आज भी जीवित है क्योंकि:
- यह नृत्य की पहचान है
- यह शास्त्रीयता को बनाए रखती है
- यह दर्शकों को संतोष का अनुभव कराती है
