कृष्ण छिद्र की अवधारणा का ऐतिहासिक विकास
कृष्ण छिद्र का विचार एकदम से नहीं आया। 18वीं शताब्दी में जॉन मिशेल और पियरे-साइमोन लाप्लास ने “डार्क स्टार” की कल्पना की थी। यानी कि ऐसे पिंड जिनसे प्रकाश निकल न सके। 20वीं शताब्दी में अल्बर्ट आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत (1915) ने गुरुत्वाकर्षण को अंतरिक्ष-काल की वक्रता के रूप में समझाया। 1916 में कार्ल श्वार्ज़शिल्ड ने आइंस्टीन के समीकरणों का हल दिया जिससे “श्वार्ज़शिल्ड त्रिज्या” और घटना क्षितिज (Event Horizon) की अवधारणा सामने आई। यहीं से कृष्ण छिद्र को ठोस गणितीय आधार मिला।
तारकीय विकास और अंतिम अवस्था
तारे अपने जीवनकाल में नाभिकीय संलयन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। यह ऊर्जा गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध संतुलन बनाती है। ईंधन समाप्त होने पर तारे का भाग्य उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है:
- कम द्रव्यमान → श्वेत बौना (White Dwarf)
- मध्यम द्रव्यमान → न्यूट्रॉन तारा
- अत्यधिक द्रव्यमान → कृष्ण छिद्र
यहीं एस. चन्द्रशेखर का क्रांतिकारी योगदान सामने आता है।
चन्द्रशेखर सीमा (Chandrasekhar Limit)
चन्द्रशेखर ने 1930 के दशक में यह सिद्ध किया कि श्वेत बौने तारों के लिए एक अधिकतम द्रव्यमान सीमा होती है - लगभग 1.44 सौर द्रव्यमान। यदि किसी तारे का द्रव्यमान इस सीमा से अधिक है तो इलेक्ट्रॉन अपघटन दाब (Electron Degeneracy Pressure) गुरुत्वाकर्षण को रोक नहीं सकता और तारा और अधिक संकुचित होता चला जाता है।
यही निष्कर्ष आगे चलकर यह समझने में निर्णायक बना कि अत्यधिक द्रव्यमान वाले तारे अंततः न्यूट्रॉन तारे या कृष्ण छिद्र में क्यों परिवर्तित होते हैं। इस प्रकार, चन्द्रशेखर सीमा ने कृष्ण छिद्र सिद्धांत के लिए भौतिक अनिवार्यता को स्पष्ट किया।
एस. चन्द्रशेखर का वैज्ञानिक संघर्ष
चन्द्रशेखर के निष्कर्ष प्रारम्भ में विवादित रहे। उस समय के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक आर्थर एडिंगटन ने उनके निष्कर्षों का सार्वजनिक रूप से विरोध किया। बावजूद इसके चन्द्रशेखर अपने गणितीय तर्कों और सैद्धान्तिक दृढ़ता पर अडिग रहे। समय ने सिद्ध किया कि उनका दृष्टिकोण सही था। आज चन्द्रशेखर सीमा खगोलभौतिकी की आधारशिला मानी जाती है।
कृष्ण छिद्र क्या है?
कृष्ण छिद्र वह क्षेत्र है जहाँ:
- पलायन वेग प्रकाश की गति से अधिक होता है
- घटना क्षितिज के भीतर से कोई सूचना बाहर नहीं आती
- केंद्र में एक एकविमीयता (Singularity) होती है जहाँ घनत्व अनंत के समीप माना जाता है
कृष्ण छिद्र के प्रकार
- तारकीय कृष्ण छिद्र – विशाल तारों के पतन से
- महाविशाल (Supermassive) कृष्ण छिद्र – आकाशगंगाओं के केंद्र में
- मध्यवर्ती कृष्ण छिद्र – अपेक्षाकृत दुर्लभ
- सूक्ष्म/आदिम कृष्ण छिद्र – प्रारम्भिक ब्रह्माण्ड की सैद्धान्तिक संभावना
घटना क्षितिज और एकविमीयता
घटना क्षितिज वह सीमा है जिसके भीतर प्रवेश करने पर वापसी असंभव है। इसके भीतर भौतिकी के ज्ञात नियम टूटते प्रतीत होते हैं। एकविमीयता पर स्थान-काल की वक्रता अत्यधिक हो जाती है। चन्द्रशेखर की गणनाएँ यह दिखाती हैं कि अत्यधिक संकुचन की प्रक्रिया अपरिहार्य है जो अंततः ऐसी अवस्थाओं तक ले जाती है।
चन्द्रशेखर और सापेक्षता
चन्द्रशेखर ने सामान्य सापेक्षता के गणितीय ढाँचे को गहराई से विकसित किया। उनकी पुस्तक The Mathematical Theory of Black Holes आज भी मानक संदर्भ मानी जाती है। उन्होंने स्थिर और घूर्णनशील कृष्ण छिद्रों, विकिरण, स्थिरता और तरंगों के अध्ययन को सुदृढ़ किया।
हॉकिंग विकिरण और आगे की प्रगति
बाद के दशकों में स्टीफन हॉकिंग ने दिखाया कि कृष्ण छिद्र पूर्णतः “काले” नहीं होते। वे क्वांटम प्रभावों के कारण विकिरण करते हैं। यह प्रगति भी चन्द्रशेखर द्वारा स्थापित गणितीय-भौतिक नींव पर ही खड़ी है।
प्रेक्षणीय प्रमाण
- गुरुत्वीय तरंगें: दो कृष्ण छिद्रों के विलय से उत्पन्न तरंगें
- इवेंट होराइज़न टेलीस्कोप: 2019 में कृष्ण छिद्र की छाया की छवि
- तारकीय कक्षाएँ: आकाशगंगा केंद्र में अदृश्य महाविशाल पिंड के प्रमाण
भारतीय विज्ञान में चन्द्रशेखर का स्थान
चन्द्रशेखर भारतीय विज्ञान की वैश्विक पहचान हैं। 1983 में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। उनका कार्य यह दर्शाता है कि सैद्धान्तिक गणित, कठोर तर्क और धैर्य कैसे ब्रह्माण्ड के सबसे गहरे रहस्यों को उजागर कर सकते हैं।
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