कार्बन डेटिंग विधि किसकी आयु निर्धारित करने के लिए अपनाई जाती है?

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कार्बन डेटिंग विधि जीवाश्मों की आयु निर्धारित करने के लिए अपनाई जाती है। कार्बन डेटिंग विधि जिसे रेडियोकार्बन डेटिंग भी कहा जाता है, पुरातत्व, भूविज्ञान और जीवाश्म विज्ञान में आयु निर्धारण की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तकनीक है। इस विधि का उपयोग मुख्यतः प्राचीन जैविक पदार्थों जैसे लकड़ी, हड्डियाँ, कोयला, बीज, कपड़ा और जीवाश्मों के अवशेष की आयु ज्ञात करने के लिए किया जाता है। इससे मानव सभ्यता के इतिहास और पृथ्वी पर जीवन के विकास को समझने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।

कार्बन डेटिंग विधि जीवाश्मों की आयु निर्धारित करने के लिए अपनाई जाती है।

कार्बन डेटिंग का सिद्धांत

वायुमंडल में कार्बन का एक रेडियोधर्मी समस्थानिक कार्बन-14 (C-14) पाया जाता है। यह कॉस्मिक किरणों के प्रभाव से नाइट्रोजन-14 से बनता है। पौधे प्रकाश संश्लेषण के दौरान कार्बन-14 को ग्रहण करते हैं और पशु-पक्षी पौधों के माध्यम से इसे अपने शरीर में शामिल करते हैं। इस प्रकार जीवित अवस्था में सभी जीवों में कार्बन-14 और कार्बन-12 का अनुपात लगभग समान रहता है।

मृत्यु के बाद परिवर्तन

जब कोई जीव मर जाता है तो उसके शरीर में नया कार्बन-14 प्रवेश करना बंद हो जाता है। इसके बाद कार्बन-14 धीरे-धीरे रेडियोधर्मी क्षय (radioactive decay) के माध्यम से नाइट्रोजन में बदलने लगता है। कार्बन-14 का अर्धायु काल लगभग 5730 वर्ष होता है। वैज्ञानिक जीवाश्म या अवशेष में बचे कार्बन-14 की मात्रा मापकर यह अनुमान लगाते हैं कि जीव की मृत्यु कितने वर्ष पहले हुई थी।

जीवाश्मों की आयु निर्धारण में भूमिका

कार्बन डेटिंग विधि का उपयोग विशेष रूप से उन जीवाश्मों और अवशेषों के लिए किया जाता है जिनकी आयु लगभग 50,000 वर्ष तक होती है। यह विधि मानव कंकालों, प्राचीन औजारों, गुफा चित्रों, दफन स्थलों और ऐतिहासिक सभ्यताओं के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि किसी क्षेत्र में मानव या अन्य जीव कब विद्यमान थे।

सीमाएँ और सावधानियाँ

हालाँकि कार्बन डेटिंग अत्यंत उपयोगी है पर इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। यह विधि केवल जैविक पदार्थों पर ही लागू होती है और बहुत अधिक प्राचीन (लाखों वर्ष पुराने) जीवाश्मों के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसे मामलों में पोटैशियम-आर्गन या यूरेनियम-सीसा जैसी अन्य डेटिंग विधियाँ अपनाई जाती हैं।

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