गौर मारिया कहाँ की एक नृत्य शैली है?

हर दिन सीखें कुछ नया — हर दिन मनाएं ज्ञान का “Happy New Year”! 🎉 जैसे नया साल नई उम्मीदों और नई शुरुआत का प्रतीक होता है वैसे ही हमारा मानना है कि हर दिन सीखने के लिए एक नया अवसर होता है।

गौर मारिया छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख आदिवासी नृत्य शैली है जो बस्तर क्षेत्र की माड़िया जनजाति द्वारा प्रस्तुत की जाती है। यह जंगली भैंसे (गौर) की गति की नकल पर आधारित अनुष्ठानिक नृत्य है जो पुरुषों और महिलाओं दोनों द्वारा समूह में किया जाता है।

गौर मारिया

उत्पत्ति और महत्व

गौर मारिया नृत्य बस्तर के दंडामी माड़िया समुदाय की प्राचीन परंपरा है जो वर्षा ऋतु में अच्छी फसल और समृद्धि की कामना से जुड़ा है। यह विवाह, जन्म, मेला और तीज जैसे अवसरों पर प्रदर्शित होता है जहां नर्तक शिकार की कहानियां और जनजातीय कथाओं को जीवंत करते हैं। नृत्य आदिवासी एकता, हर्षोल्लास और प्रकृति पूजा को दर्शाता है।

प्रस्तुति शैली

नर्तक गोलाकार जुलूस बनाते हैं जिसमें पुरुष ढोल, मांदर और ताल बजाते हुए भैंसे जैसी गतियां अपनाते हैं। महिलाएं भाले या छड़ी थामकर जमीन पर ठोकती हैं तेज ताल पर घूमते और मंडल बनाते हुए नृत्य करते हैं। यह सजीव और ऊर्जावान प्रदर्शन समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर को मजबूत करता है।

वेशभूषा और आभूषण

पुरुष नर्तक सिर पर गौर या जंगली भैंस के सींगों वाला मुकुट (कोकोटा) पहनते हैं जो कौड़ियों, मोर पंख और कलगी से सजा होता है; शरीर पर काली मिट्टी लगाते हैं। महिलाएं लाल दुपट्टा, पीतल का मुकुट (टिगे), मोहरी माला और घुंघरू युक्त छड़ी धारण करती हैं। यह वेशभूषा नृत्य को भैंसे की शक्ति से जोड़ती है।

Post a Comment