हर दिन सीखें कुछ नया — हर दिन मनाएं ज्ञान का “Happy New Year”! 🎉 जैसे नया साल नई उम्मीदों और नई शुरुआत का प्रतीक होता है वैसे ही हमारा मानना है कि हर दिन सीखने के लिए एक नया अवसर होता है।
उत्पत्ति और महत्व
पाइका नृत्य मूल रूप से मुंडा जनजाति द्वारा युद्ध के मैदान में दुश्मनों को ललकारने के लिए विकसित किया गया था। यह झारखंड के छोटानागपुर पठार क्षेत्र विशेषकर रांची, खूंटी, लोहरदगा और पूर्वी सिंहभूम जैसे जिलों में प्रचलित है। अब यह धार्मिक जुलूसों, विशेष अतिथियों के स्वागत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रस्तुत होता है।
प्रस्तुति शैली
यह नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाता है जिसमें कम से कम 18 कलाकार भाग लेते हैं। नर्तक गोल घेरे में तेज छलांगें लगाते हुए हाथों को युद्ध मुद्रा में उठाते हैं और गगनभेदी युद्धघोष करते हैं। वाद्ययंत्रों जैसे ढोल, मांदर, नगाड़ा, शहनाई, झाल और झांझर की थाप पर तालमेल बनाए रखा जाता है।
वेशभूषा और हथियार
कलाकार रंग-बिरंगी पगड़ी बांधते हैं जिसमें जंगली घास या मोर पंख की कलगी लगी होती है। वे घुंघरू, चमकदार पोशाक पहनते हैं और हाथों में तलवार, ढाल, भाला या तीर-कमान थामते हैं। यह वेशभूषा उनकी योद्धा परंपरा को जीवंत बनाती है।
सांस्कृतिक प्रभाव
आज पाइका नृत्य राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर झारखंड की पहचान बन चुका है। कलाकार जैसे गुलाप सिंह मुंडा और शहाबुद्दीन अंसारी इसे जीवित रखने के लिए प्रयासरत हैं जहां एक प्रस्तुति के लिए लगभग 30,000 रुपये शुल्क लिया जाता है। यह नृत्य मुंडा समुदाय की एकता, वीरता और सांस्कृतिक गौरव को दर्शाता है।
