थुल्लल नृत्य की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?

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थुल्लल नृत्य की उत्पत्ति केरल में मानी जाती है और यह वहां की एक अत्यंत लोकप्रिय व्यंग्यात्मक लोक नाट्य नृत्य शैली है।

थुल्लल नृत्य
भारत का दक्षिणी राज्य केरल अपनी समृद्ध नृत्य एवं नाट्य परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक विशिष्ट और लोकप्रिय शैली है थुल्लल नृत्य जिसकी उत्पत्ति केरल में हुई और जो आज भी मंदिरों एवं सांस्कृतिक आयोजनों में जीवंत रूप से प्रस्तुत की जाती है। थुल्लल अपनी सरल भाषा, तीखे व्यंग्य और आकर्षक मंचन शैली के कारण आम जनता के बीच विशेष रूप से प्रिय रहा है।

उत्पत्ति और रचनाकार

थुल्लल नृत्य का उद्भव 18वीं शताब्दी में माना जाता है और इसकी रचना प्रसिद्ध मलयालम कवि कुंचन नांबियार ने की थी। कहा जाता है कि उन्होंने उस समय प्रचलित चकयार कूथु की जटिलता और अभिजात्य प्रकृति के विकल्प के रूप में एक ऐसी कला शैली विकसित की जो सीधे आम लोगों से संवाद कर सके। इस प्रकार थुल्लल ने सामाजिक–राजनीतिक व्यंग्य और धार्मिक कथाओं को सरल, समझने योग्य भाषा और हास्य के माध्यम से प्रस्तुत करने का नया माध्यम प्रदान किया।

नृत्य की मुख्य विशेषताएँ

थुल्लल मूलतः एक एकल (solo) नृत्य–नाट्य रूप है जिसमें कलाकार स्वयं गाता है, अभिनय करता है और नृत्य के माध्यम से कथा को जीवंत बनाता है। इसमें प्रयोग होने वाले गीत सरल मलयालम भाषा में होते हैं जिनमें हास्य, व्यंग्य और सामाजिक संदेश का प्रभावी मिश्रण दिखाई देता है। नृत्य के साथ मद्दलम, झांझ जैसे वाद्ययंत्रों की संगत रहती है जो लय और गति को सशक्त बनाते हैं।

प्रकार और भंगिमाएँ

थुल्लल नृत्य के तीन प्रमुख प्रकार माने जाते हैं: 
  • ओट्टन थुल्लल  
  • सीथंकन थुल्लल  
  • परायन थुल्लल
इन तीनों में पोशाक, गति, लय और अभिनय शैली में अंतर दिखाई देता है। ओट्टन थुल्लल सबसे अधिक लोकप्रिय है जिसमें तेज लय, तीव्र गतियाँ और अत्यंत आकर्षक, चमकीली पोशाक का प्रयोग किया जाता है। परायन थुल्लल अपेक्षाकृत धीमी गति वाला होता है जिसमें अभिनय और हाथों की मुद्राओं के माध्यम से अर्थ स्पष्ट करने पर अधिक जोर दिया जाता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

थुल्लल नृत्य केरल की सामाजिक चेतना और लोक–विचारधारा का दर्पण माना जाता है। इस नृत्य के माध्यम से पौराणिक कथाओं के साथ–साथ उस समय की सामाजिक विसंगतियों, ढोंग, अन्याय और पाखंड पर तीखा व्यंग्य किया जाता था जिससे जनता में जागरूकता और विचार उत्पन्न हो सकें। मंदिरों और उत्सवों के अवसर पर किए जाने वाले प्रस्तुतियों ने इसे न केवल मनोरंजन का साधन बनाया बल्कि जनशिक्षा और सांस्कृतिक एकता का माध्यम भी बना दिया।

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