हाइड्रोजन बम किस सिद्धांत पर आधारित है?

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हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) के सिद्धांत पर आधारित है। हाइड्रोजन बम जिसे थर्मोन्यूक्लियर बम भी कहा जाता है, आधुनिक भौतिकी की उन अवधारणाओं में से एक है जो नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) के सिद्धांत पर आधारित हैं। यह सिद्धांत बताता है कि जब हल्के नाभिक अत्यधिक ताप और दाब की परिस्थितियों में आपस में मिलते हैं तो भारी नाभिक का निर्माण होता है और अत्यधिक ऊर्जा मुक्त होती है।

हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) के सिद्धांत पर आधारित है।

नाभिकीय संलयन क्या है?

नाभिकीय संलयन वह प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक हल्के परमाणु नाभिक (जैसे हाइड्रोजन के समस्थानिक) आपस में जुड़कर एक भारी नाभिक बनाते हैं। इस प्रक्रिया में द्रव्यमान का एक छोटा भाग ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है जो आइंस्टीन के द्रव्यमान–ऊर्जा संबंध (E=mc^2) के अनुसार अत्यंत विशाल मात्रा में ऊर्जा प्रदान करता है।

हाइड्रोजन बम का मूल सिद्धांत

हाइड्रोजन बम की कार्यप्रणाली का आधार हाइड्रोजन के समस्थानिकों (जैसे ड्यूटीरियम और ट्रिटियम) के बीच होने वाला नाभिकीय संलयन है। संलयन के लिए आवश्यक:
  • अत्यधिक उच्च ताप
  • अत्यधिक उच्च दाब की परिस्थितियाँ बनते ही हल्के नाभिक आपस में मिलते हैं और बहुत अधिक ऊर्जा एक साथ मुक्त होती है। 
यही कारण है कि हाइड्रोजन बम की ऊर्जा क्षमता पारंपरिक नाभिकीय बमों से कहीं अधिक होती है।

नाभिकीय विखंडन और संलयन में अंतर

  • नाभिकीय विखंडन (Fission) में भारी नाभिक टूटकर हल्के नाभिक बनाते हैं और ऊर्जा निकलती है।
  • नाभिकीय संलयन (Fusion) में हल्के नाभिक जुड़कर भारी नाभिक बनाते हैं और उससे भी अधिक ऊर्जा निकलती है।
हाइड्रोजन बम में मुख्य ऊर्जा स्रोत संलयन प्रक्रिया ही होती है।

प्राकृतिक उदाहरण

नाभिकीय संलयन केवल मानव-निर्मित प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है। सूर्य और अन्य तारे अपनी ऊर्जा का उत्पादन भी इसी संलयन प्रक्रिया से करते हैं। इस प्रकार हाइड्रोजन बम का सिद्धांत प्रकृति में पहले से विद्यमान एक मूलभूत प्रक्रिया पर आधारित है।

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